आती-जाती सत्ता के साथ बदलती नेताओं की वफादारी
पारिवारिक और सामाजिक जीवन में जहां वफादारी सबसे बड़ी पूंजी होती है, वहीं क्या सियासत की दुनिया में वफादारी सबसे सस्ती चीज होती है? आज यह सवाल हर तरफ पूछा जा रहा है। क्या जब तक सत्ता का ‘सूरज’ चमकता रहता है, दरबार में भीड़ लगी रहती है। लेकिन जैसे ही सूरज ‘अस्ताचल’ होने लगता है, सियासी ‘महफिल’ में सन्नाटा छा जाता है। पश्चिम बंगाल की राजनीति में इस वक्त ठीक यही हो रहा है। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के बाद तृणमूल कांग्रेस की बगावत ने पार्टी को पूरी तरह से तहस-नहस कर दिया है। दिल्ली से कोलकाता तक पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी की मनमानी के खिलाफ पार्टी के 20 लोकसभा सांसदों और 58 से अधिक विधायकों ने मोर्चा खोल दिया है। वैसे यह महज एक पार्टी का संकट नहीं है, यह भारतीय लोकतंत्र के उस गहरे घाव को उजागर करता है, जिसे मौकापरस्ती का नासूर कहते हैं। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में भाजपा ने 45.43 प्रतिशत वोट पाकर सत्ता पर कब्जा किया और ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस का वोट शेयर 7.16 प्रतिशत गिर गया। विधानसभा चुनाव 2026 के परिणाम में ममता बनर्जी की पार्टी को मात्र 80 सीटें मिलीं। ममता बनर्जी के 35 में से 22 मंत्रियों को हार का सामना करना पड़ा, यानी करीब 63 प्रतिशत मंत्री चुनाव हार गए। खुद ममता बनर्जी भी अपने पुराने गढ़ भवानीपुर में हार गईं। पंद्रह साल की सत्ता का यह अंत था, लेकिन असली तमाशा इसके बाद शुरू हुआ।
पिछले 14 दिन में ही पांच बड़े नेताओं ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर राय ने पार्टी की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया है और अपनी राज्यसभा सीट भी छोड़ दी है। जिस सुखेंदु शेखर राय को ममता का सबसे भरोसेमंद सिपाही माना जाता था, उन्होंने जाते-जाते भाजपा की तारीफ में पत्र लिखा। 14 बागी सांसद भाजपा के राष्ट्रीय रणनीतिकार और केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के आवास पर लंच के लिए जुटे, जहां पश्चिम बंगाल के नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी भी मौजूद थे। यह लंच महज खाने का नहीं, सियासी पाला बदलने का आयोजन था। बागियों की फेहरिस्त लंबी है। काकोली घोष दस्तीदार, जगदीश चंद्र बसुनिया, खलीलुर रहमान, यूसुफ पठान, अबू ताहिर खान, पार्थ भौमिक, बापी हलदार, सायोनी घोष, माला रॉय, मिताली बाग, दीपक अधिकारी, जून मालिया, अरूप चक्रवर्ती और शत्रुघ्न सिन्हा समेत 19 सांसदों के नाम बागी सूची में हैं। टीएमसी सांसद शताब्दी रॉय ने खुलकर कहा कि भारी भ्रष्टाचार की वजह से पार्टी की हार हुई है। उन्होंने संकेत दिए कि वे एनडीए का समर्थन करेंगी और अपने निर्वाचन क्षेत्र के विकास के लिए मौजूदा सरकार के साथ काम करेंगी। टीएमसी के पूर्व राष्ट्रीय प्रवक्ता शांतनु सेन ने भी पार्टी से इस्तीफा देकर ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व को चुनौती दी।
लेकिन यह बीमारी सिर्फ तृणमूल की नहीं है। भारतीय राजनीति का पूरा इतिहास ऐसे मौकापरस्तों से भरा पड़ा है, जिन्होंने सत्ता के लिए अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता को ताक पर रख दिया। 2014 में जब नरेंद्र मोदी की अगुआई में भाजपा ने ऐतिहासिक बहुमत हासिल किया, तब से कांग्रेस का एक के बाद एक बड़ा चेहरा पार्टी छोड़ता चला गया। गुलाम नबी आजाद, ज्योतिरादित्य सिंधिया, जितिन प्रसाद, हेमंत बिस्वा सरमा, जगदंबिका पाल, अदिति सिंह काफी लंबी लिस्ट है। राहुल-प्रियंका के सबसे करीबी आरपीएन सिंह तक ने भी कांग्रेस का साथ छोड़ दिया। ये वो लोग थे, जो कभी गांधी परिवार के सबसे करीबी माने जाते थे। ज्योतिरादित्य सिंधिया ने तो मध्य प्रदेश में कांग्रेस की कमलनाथ सरकार ही पलट दी और सीधे केंद्र में मंत्री बन गए। महाराष्ट्र कांग्रेस के बड़े नेता और पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया और अगले ही दिन भाजपा में शामिल हो गए। उन्होंने कहा कि कांग्रेस में निर्णय लेने की क्षमता नहीं है। अमरिंदर सिंह, जो पंजाब के मुख्यमंत्री रहे और जिन्होंने पाकिस्तान से लड़ाई तक की बात की थी, वे भी कांग्रेस छोड़कर अपनी पार्टी बनाकर बाद में भाजपा की गोद में जा बैठे। नारायण राणे, जो महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री रहे, उन्होंने भी यही रास्ता चुना। एक नेता ने जाते हुए कहा कि उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि वे 55 साल के साथ को छोड़कर पार्टी बदल लेंगे, लेकिन देश के लिए मोदी जी का विजन बहुत बड़ा है। पचपन साल की निष्ठा रातोंरात इस तरह बदल जाती है, यह भारतीय लोकतंत्र के लिए कोई गौरव की बात नहीं है। इन सबके बीच एक सवाल जरूर उठता है कि क्या इन नेताओं में से कोई एक भी वैचारिक आधार पर पार्टी बदलता है? जवाब ज्यादातर नकारात्मक ही है। टिकट न मिलना, पद से हटाया जाना, या सत्ता की धूप से दूर हो जाना, यही तीन कारण होते हैं, जो नेताओं को रातोंरात क्रांतिकारी बना देते हैं। ज्योतिरादित्य सिंधिया को मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री पद नहीं मिला, तो उन्होंने पार्टी ही बदल दी। जितिन प्रसाद को उत्तर प्रदेश में तवज्जो नहीं मिली, तो उन्होंने भाजपा में शरण ली। यह बात और है कि भाजपा ने भी इन्हें उचित महत्व देने में कोई कमी नहीं रखी। तृणमूल के संदर्भ में यह और भी विडंबनापूर्ण है। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि ममता बनर्जी की पहचान हमेशा से एक फाइटर नेता की रही है। 1998 में कांग्रेस से अलग होकर उन्होंने अकेले दम पर तृणमूल कांग्रेस बनाई और 2011 में 34 साल पुराने वामपंथ को सत्ता से उखाड़ फेंका। लेकिन आज उनकी खुद की बनाई पार्टी में वही हो रहा है, जो उन्होंने कांग्रेस में महसूस करके पार्टी छोड़ी थी। यह राजनीतिक न्याय का एक कड़वा चक्र है।
भारतीय राजनीति में दल-बदल को रोकने के लिए दसवीं अनुसूची यानी एंटी-डिफेक्शन लॉ बना, लेकिन नेताओं ने उसकी भी काट निकाल ली। दो-तिहाई का फॉर्मूला हो या व्यक्तिगत इस्तीफे का रास्ता, जहां कानून की दीवार खड़ी होती है, सियासतदान वहां सुरंग खोद लेते हैं। तृणमूल के बागियों ने भी यही किया। व्यक्तिगत इस्तीफे देकर या अलग गुट बनाकर वे उस कानूनी जाल से बाहर निकलने की कोशिश में हैं, जो उन्हें अयोग्य घोषित कर सकता है। असल सवाल यह नहीं है कि ममता के साथी उन्हें क्यों छोड़ रहे हैं या कांग्रेस के दिग्गज भाजपा में क्यों जा रहे हैं। असल सवाल यह है कि भारतीय मतदाता कब तक इस तरह के नेताओं को माफ करता रहेगा? जो नेता आज एक पार्टी की विचारधारा को गाली देकर दूसरी पार्टी में जाता है, वह अगले चुनाव में फिर टिकट मांगता है और अक्सर मिल भी जाता है। यह लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना है। पश्चिम बंगाल की ताजा सियासत एक आईना है, जिसमें पूरे भारत की राजनीति का चेहरा दिखता है। सत्ता जब तक रहती है, वफादारी की कसमें खाई जाती हैं। सत्ता जाते ही वफादारी के ये धागे खुद-ब-खुद टूट जाते हैं। ममता बनर्जी ने जो बोया था, वह काटने का वक्त आ गया। लेकिन इस फसल से सीख सिर्फ ममता के लिए नहीं, हर उस दल के लिए है, जो अपने नेताओं को विचारधारा की बजाय सत्ता के लालच पर टिकाए रखता है। राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि संगठन की जड़ें सत्ता की जमीन में नहीं, जनता के विश्वास में होती हैं। जिस दिन यह जड़ें मजबूत होंगी, उस दिन मौकापरस्तों के लिए कोई जगह नहीं बचेगी।
— संजय सक्सेना
