कविता

दूर हो बहुत घर की याद तो आती होगी

बाहर ही मिलता है सब कुछ
यह नासमझी की हैं बातें
अमेरिका और कनाडा की रातों से
हैं सुंदर मेरे भारत की रातें

क्या वहां मिलेगा जो यहां नहीं मिलता
देखा है बहुत ऊंचा उड़ने का सपना
वह रिश्ते मां बाप का प्यार नहीं मिलेगा
जिसके लिए छोड़ दिया घर अपना

दूर हो बहुत घर की याद तो आती होगी
सपनों की दीवार बीच मे आ जाती तो होगी
मिलता होगा जब कोई हमवतन तो
याद वतन की बहुत आती तो होगी

गांव खेत खलिहान दोस्त सब पीछे छूटे
दूर हुए भाई बंधु रिश्ते नाते सब टूटे
देखते रहते हैं राह बूढ़े माता पिता तुम्हारी
निकले खून के सब रिश्ते भी झूठे

आती होगी याद वह गांव की हवा ठंडी ठंडी
कहां भूलती होगी वह पहाड़ी से जाती पगडंडी
न कोई दोस्त न कोई अपना है विदेश में
याद तो आती होगी शाम को लगती दोस्तों की वह मंडी

आ जा विदेश छोड़कर तुझको धरती तेरी पुकारती
पत्थरा गई हैं बूढ़ी आंखें तेरी राह निहारती
पराए हैं लोग वहां कोई नहीं है अपना
कैसे भूला उस मां को जो आने पर तेरी आरती थी उतारती

— रवींद्र कुमार शर्मा

*रवींद्र कुमार शर्मा

घुमारवीं जिला बिलासपुर हि प्र

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