मुक्तक/दोहा

बाल-दोहे

मिलकर बैठे बाल सब, खोले ज्ञान-किताब।
चित्रों से सीखें नए, सुंदर रहे जवाब॥

पढ़ना-लिखना खेल सा, मन में भरे उजास।
ज्ञान-सुमन खिलने लगे, मिटे अज्ञान-निवास॥

छोटे-छोटे हाथ हैं, बड़े-बड़े अरमान।
मेहनत से आगे बढ़ें, पाएँ सच्चा मान॥

मित्र बने जब साथ में, बढ़ता खूब लगाव।
हँसी-खुशी के संग सदा, सीखें अच्छे भाव॥

चित्र-पुस्तिका देख कर, जागे नई उड़ान।
जिज्ञासा के पंख से, छू लें वे आसमान॥

बचपन की मुस्कान में, छिपा सुनहरा काल।
पढ़-लिखकर जग में करें, अपना नाम कमाल॥

— डॉ. प्रियंका सौरभ

*डॉ. प्रियंका सौरभ

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस, कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, (मो.) 7015375570 (वार्ता+वाट्स एप) facebook - https://www.facebook.com/PriyankaSaurabh20/ twitter- https://twitter.com/pari_saurabh

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