गीतिका/ग़ज़ल

माल गायब

इधर आँख झपकी, उधर माल गायब।
उतरा मुखौटा, हुई चाल गायब।

योद्धा थे, दुश्मन से लड़ने चले थे,
तलवार कर में, मगर ढाल गायब।

जब तक कसी थी, बजी खूब ढोलक,
दिया माँगने पर, तो थी खाल गायब।

गाया – बजाया, किया कीर्तन भी,
खुली पोल पापों की, सुर-ताल गायब।

खँगाली गयीं सीसीटीवी की फोटो,
फँसा जबसे मुखिया, भौकाल गायब।

बड़े भक्त भोले, चढ़ावा चढ़ाते,
किया है पुजारी ने सब थाल गायब।

बड़ी धूम से जो सजाए थे मेले,
वहीं से हुए हैं कई लाल गायब।

निर्धन का भोजन सादा ही रहता,
कभी सब्जी गायब, कभी दाल गायब।

गरम जेब होते ही अधिकारियों की,
अपराध की जाँच – पड़ताल गायब।

— गौरीशंकर वैश्य विनम्र

*गौरीशंकर वैश्य विनम्र

117 आदिलनगर, विकासनगर लखनऊ 226022 दूरभाष 09956087585

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