फिल्मों के लिए सेंसर बोर्ड भी ध्यान दे
आजकल फिल्मों में आपत्तिजनक और गाली-गलौज वाली भाषा एवं सिगरेट ,शराब का खुलेआम अभिनय का प्रयोग किए जाने लगा है।जबकि महिमामंडन पर कई वर्षों पूर्व ही रोक लगाई जा चुकी थी।कई फिल्मों में इसको फिल्माने के बाद पर्दे पर हानिकारक शब्द का उपयोग कर चेतावनी दी भी जाने लगी है।कुछ भी हो जब इनके प्रयोग पर सेंसर बोर्ड भी जाने क्यूँ चुप है।शराब,सिगरेट, भद्दी गाली से भरी फिल्में कमाई तो कर लेती है।युवा पीढ़ी पर इसका कितना प्रभाव पड़ेगा इसकी किसी को कोई चिंता नही है।फिल्मों को प्रभावी बनाने हेतु इन चीजों का प्रयोग बंद हो।परिवार में बैठ कर महंगे टिकट लेकर लोग स्वस्थ मनोरंजन चाहते है।सेंसर बोर्ड वयस्कों के लिए ग्रेड इस्तेमाल करती है वैसे ही इनके लिए भी ग्रेड बनाई जावे। फिल्मों में ऐसी भाषा को खुलेआम अनुमति देने पर रोक लगे। मनोरंजन के नाम पर अपशब्दों को सामान्य बनाना सामाजिक ढांचे के लिए घातक सिद्ध हो सकता है।
— संजय वर्मा “दृष्टि”
