आँगन की क्रिकेट
नन्हे हाथों में बल्ला है,
आँखों में अरमान।
आँगन ही बन गया आज,
सपनों का मैदान॥
हँसी-ठिठोली, दौड़-भाग,
मस्ती की भरमार।
जीत-हार से दूर हैं,
प्यारा यह संसार॥
बहना फेंके पीली गेंद,
भैया दे ललकार।
मिल-जुलकर जो खेलते,
वही सच्चे परिवार॥
मोबाइल को छोड़कर,
खेलें सब मिल साथ।
बचपन ऐसे ही खिले,
हँसी रहे दिन-रात॥
— डॉ. प्रियंका सौरभ
