कविता

नशे में डूब रही है जवानी

न वह चूल्हे की रोटी न वह घड़े का पानी
बदल सी गई कुछ ऐसी ज़िंदगानी
बुढापा भी कुछ और सा बीत रहा अब
अलग ही चाल चल रही कुछ आज की जवानी

नशे की स्याही से लिख रहा युवा
आज की अपनी यह कहानी
उस देश का भविष्य क्या होगा
जहां नशे में डूब रही है जवानी

सुनते किसी की नहीं करे अपनी मनमानी
जान कर भी अनजान हैं कर रहे नादानी
किस दिशा में जा रही आज की युवा पीढ़ी
कैसे हो गई यह नशे की दीवानी

नशे के कारोबार में जो लिप्त है
खून नहीं उनकी रगों में है पानी
अपनी औलाद भी जब करेगी नशा
तब बनेगी फिर एक नई कहानी

आज की पीढ़ी को बहुत मुश्किल है समझाना
अच्छा नहीं लगता उनको बार बार बताना
टोका टोकी तो बिल्कुल भी पसंद नहीं
मन की करेंगे चाहे इधर से उधर हो जाये जमाना

बुजुर्गों की बातों की हंसी हैं उड़ाते
आजाद रहना चाहते हैं बन्धन उनको नहीं भाते
कैसा मुश्किल का दौर है यह आया
मां बाप को बृद्धाश्रम पहुंचाने में नहीं है शर्माते

— रवींद्र कुमार शर्मा

*रवींद्र कुमार शर्मा

घुमारवीं जिला बिलासपुर हि प्र

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