कविता

कविता

सड़ चुका एक
वृक्ष का तना,
अपने भीतर यादों का
अनगिनत खज़ाना सँजोए हुए।
क्या उसे उखाड़ फेंक दूँ,
या
फिर वैसे ही रहने दूँ?
कोई निर्णय मन में नहीं आता।
उससे अब भी गहराई से
जुड़ा हुआ है
न जाने कैसा एक रहस्य।

— एस. अमन्दा सरत्चन्द्र

एस. अमन्दा सरत्चन्द्र

श्री लंका

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