चंदन तिलक
चंदन तिलक न चाहिए, ना गंगा का पान।
औरों का दिल न दुखे, बस इतना हो भान।।१.
दिया न पानी बाप को, पन चौथे में आज।
‘गजानंद’ कल बिगड़ता, सफल न होते काज।।२.
पलता था जब कोख में, सपने बुने हजार।
दुख देता मां-बाप को, सच रूठे करतार।।३.
घर में नित रोती रहे, बूढ़ी आंखें चार।
धन वैभव सुख संपदा, जाते कब उस द्वार।।४
मात-पिता की चाकरी, जहां न आठों याम।
ऐसे दुष्ट समाज को, बारंबार प्रणाम।।५.
— गजानंद डिगोनिया ‘जिज्ञासु’
