कविता

जिंदगी

पता नहीं ये जिंदगी
मुझसे क्या करवाएगी।
करना मैं कुछ चाहूं,
हो कुछ जाए।
न जाने कैसी ये कसक,
कुछ छूट रहा जैसे मुझसे।
कभी खुशी, कभी उदासी,
मन मुझे आगे-पीछे टटोले।
जानूं न मैं क्या है जिंदगी,
क्या है इसकी ललशी।

जानना चाहूं अपने आप को,
कैसी है ये पहेली।
जानूं न कहाँ जाएगा
ये जिंदगी का सफर।
जानूं न कहाँ हूं आया,
कहाँ है जाना।
सभी पैसा-पैसा, काम-काम करते हैं,
लेकिन जीवन की सच्चाई
कोई नहीं जानना चाहता।
परन्तु मैं समझना चाहता हूं —
क्या है ये जिंदगी।

सुरेन्द्र कल्याण बुटाना

सुरेन्द्र कल्याण बुटाना

करनाल, हरियाणा मो.: 8708889653 ईमेल: surenderkalyan007@gmail.com

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