कविता

जन्मदिवस

बढ़ता चला जा रहा हूँ मृत्यु के करीब,
शनैः शनैः,अनवरत—
आगे बढ़ने की प्रक्रिया
जारी है सतत।
दिन-ब-दिन कुछ खोते हुए,
सबकी बधाइयाँ लेते हुए,
काफी समय बाद
जब देखता हूं पीछे मुड़कर,
लगता है जैसे बचपन से
बुढ़ापे में आ गया हूँ उड़कर।
खेलकूद, शिक्षा, प्रेयसी, पत्नी,
पुत्र और पुत्री—
जीवन चलता रहा
मानो एक ही सूत्र में बँधी कड़ी।
मौके आए कई अच्छे पद के,
पर आड़े आईं सीमाएँ
मेरी औकात और सामाजिक स्थिति की—
वही सरहदें
जो हर कदम पर
मुझे रोकती रहीं, तोड़ती रहीं।
भरोसा दिलाने वाले अपने
एक-एक कर मुकर गए,
अपनी जिम्मेदारियों का बोझ
मुझ पर छोड़कर उबर गए।
फिर शुरू हुआ दौर संघर्ष का—
चंद सिक्के कमाने का,
और शिक्षा के विमर्श में
खुद को बचाए रखने का।
राहें गुज़रीं कठिन परिश्रम से,
मैं दूर होता गया
अपनी चाह और समझ से।
फिर एक बार आया अवसर—
अपनी तालीम को समेटने का,
खुद से शिक्षा की डोर
फिर से लपेटने का।
दाँव सही दिशा में चला,
ज़िंदगी एक तय राह पर निकल पड़ी।
पर कुछ उलझनें आज भी
भीतर कुलबुला रही हैं,
जीवन अब भी
मुझे जूझने को बुला रही है।
खत्म हो गया है बालपन,
और अब मैं
सीधा पचपन पर खड़ा हूँ।

— राजेन्द्र लाहिरी

राजेन्द्र लाहिरी

पामगढ़, जिला जांजगीर चाम्पा, छ. ग.495554

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