आख़िरी ख़र्च
बुज़ुर्ग असलम साहब ने अपनी पूरी ज़िंदगी का एक-एक तिनका जोड़कर अपने इकलौते बेटे, फ़रहान, को इस क़ाबिल बनाया था कि वह विदेश जाकर ख़ूब नाम और पैसा कमाए। बेटा विदेश चला भी गया, उसने वहां बहुत पैसा और शोहरत कमाई। लेकिन पीछे छूट गए बूढ़े मां-बाप और उनका कभी न ख़त्म होने वाला इंतज़ार।
वक़्त गुज़रता गया और एक दिन मां की तबीयत अचानक बहुत बिगड़ गई और उन्होंने दम तोड़ दिया। टूट चुके असलम साहब ने कांपते हाथों से बेटे को मैसेज (संदेश) भेजा।
बेटा अगली ही फ़्लाइट से घर पहुंच गया। असलम साहब की पथराई आंखों ने जब बेटे को अकेले देखा, तो उन्होंने बेधड़क पूछा, “बेटा… बहू और मुन्ना नहीं आए?”
फ़रहान ने बिना किसी हिचकिचाहट के अपना बैग बेड पर रखा और बेहद ठंडे लहज़े में बोला, “पापा, उसने (बहू ने) कहा कि मम्मी की तो डेथ हो ही गई है, अब हमारे सबके आने-जाने में काफ़ी ख़र्च हो जाएगा। इतनी दूर से अचानक टिकट कराने में बहुत पैसा लगता है।”
फ़रहान की यह बात असलम साहब के सीने में तीर की तरह चुभ गई। वह शख़्स जिसने अपनी ज़िंदगी की पाई-पाई बेटे के भविष्य के लिए लगा दी थी, आज उसी बेटे को अपनी मां के जनाज़े पर आने में “ख़र्च” ज़्यादा लग रहा था। असलम साहब सन्न रह गए। उनका दिल अंदर तक टूट गया।
वह बिना कुछ बोले, भारी कदमों से अंदर अपने कमरे में चले गए।
अभी कुछ ही मिनट बीते थे कि अचानक अंदर के कमरे से गोली चलने की भयानक आवाज़ आई। फ़रहान घबराकर तेजी से अंदर भागा। कमरे का मंज़र देखकर उसके पैरों तले जमीन ख़िसक गई,असलम साहब ख़ून से लथपथ ज़मीन पर गिरे हुए थे।
उनके सिरहाने एक छोटा सा कागज़ का टुकड़ा रखा था, जिस पर कांपते हाथों से लिखा था।
”बेटा, मां के साथ मेरा भी अंतिम संस्कार करके ही चले जाओ… ताकि दोबारा आने-जाने का तुम्हारा ख़र्च बच जाए।”
फ़रहान उस कागज़ को हाथ में लिए जड़ हो गया। आज उसके पास दुनिया भर की दौलत थी, लेकिन उस दौलत की क़ीमत चुकाने के लिए अब उसके पास कोई रिश्ता नहीं बचा था।
— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़
