कविता

रश्मि बने आए हो!

रश्मि बने आए हो,
रोशन भव छाये हो;
पल्लव बिच झाँके हो,
छवि निज दिखलाए हो!

हर दीप्ति कितनी किरण,
विकरित हैं, कितनी भुवन;
कितनी लहर, कितनी महर,
कितने हैं, आह्वाहन!

कितने रंग, कितने ढँग,
आच्छादित हर अंशुन;
अनंतित औ आनन्दित,
प्रभा हरेक प्रभु दीखत!

दृग सीमित दृश्य लखत,
दिग्दर्शन भव पाबत;
दृष्टा जब मन होबत,
भूमा उर आजाबत!

आँखिन हर देखे हो,
अंगन बिच थिरके हो;
‘मधु’ आँगन खेले हो,
विंदु हर विहरे हो!

✍🏻 डॉ. गोपाल बघेल ‘मधु’

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