प्रेम पुष्प
प्रेम न बोले शोर से, बोले मन की बात।
मौन अधर मुस्काइए, जग जाएँ जज़्बात॥
प्रेम नदी की धार है, निर्मल शीतल नीर।
लगीं इसमें जो डुबकियाँ मिटे हृदय की पीर॥
प्रेम अगर सच्चा मिले, जीवन बने बहार।
सूखी डाली भी लगे, जैसे हो गुलज़ार॥
प्रेम दीप विश्वास का, जलता रहे सदैव।
आँधी चाहे लाख हो, झुक जाएँ सब दैव॥
रूठे पल भी प्रेम से, बन जाते त्योहार।
दो मीठे से बोल ही, कर देते हैं उद्धार॥
तन से बढ़कर मन मिले, मन से बढ़कर प्राण।
ऐसा प्रेम तो विरले मिले, जैसे गीता-ज्ञान॥
— रेनू ‘अंशुल’
