चंद अशआर
वक़्त
सरक जाता है वक़्त मिट्टी की तरह;
मुट्ठी में किसी के रुका है कभी।।
दो रास्ते
ख़ुदा ने बख़्शे हैं महज़ दो ही तो रास्ते—
दे जा या छोड़ जा, नहीं कुछ ले जाने वास्ते।।
नज़र
अगर दिखें जुदा-जुदा, तो है ये फेर-ए-नज़र;
चलते हैं साथ-साथ, नदिया के पाट बेख़बर।।
हमसफ़र
कभी कहते हैं कि सितमगर हूँ मैं,
कभी मुझे ही हमसफ़र बताते हैं।।
जाने कौन हूँ, किसका भुलाया हूँ मैं,
जिसे मिला, वही मुझे सिफ़र बताते हैं।।
बेसहारे
छोड़कर हमें, जो किनारे हो गये,
दरअसल, वो ख़ुद ही बेसहारे हो गये।।
गुमाँ था कि वो साहिल पे पहुँच गये,
मगर भीड़ में ख़ुद कहीं, वही खो गये।।
सुपुर्द-ए-ख़ाक
दिन-ब-दिन सुपुर्द-ए-ख़ाक हुए जाते हो,
और मुग़ालता है कि तुम जिए जाते हो।।
जनाब-ए-वाला, दूरी तय नहीं—घटी है,
आहिस्ता-आहिस्ता क़रीब-ए-ख़ुदा हुए जाते हो।।
— पंकज नैथानी ‘सिद्धा’
