कविता
सोच के दायरे से जरा बाहर निकल तो सही
उम्मीदों के सरफिरे नश्तर से दूरी बना तो सही
कब सांझ हो जाए जीवन की क्या पता
कभी खुद की बात खुद से कर तो सही
आज इसका दुःख कल उसका दुःख
संसार के झमेलों से कभी आभार तो जता
जिंदगी से लड़कर तू यहाँ तक तो आ चुका
सोच के अंधेरों से जरा रोशनी में आ तो सही
क्या पाया तूने सब कुछ त्याग कर
क्या कोई तेरे लिए भी तड़फा कभी
जरूरत तेरी सिर्फ मतलब तक जरूरी रही
क्या तेरे जख्मों को किसी ने सहलाया कभी
मंदिर मंदिर दुआ तू मांगता रहा
कसमें जिनके प्रेम की खाता रहा
गुलदस्ता था तू उनके लिए सिर्फ काँच का
ड्राइंगरूम के लिए वो गुलाब रोज लाता रहा
वक्त है आज भी समा ये फिर रहेगा नहीं
जी ले अपनी जिंदगी ये वक्त रोज आता नहीं
— वर्षा वार्ष्णेय
