कविता

अनकहा इंतज़ार

राज को राज रहने दो,
नाराज को नाराज रहने दो,
ये नाराजगी होती ही नहीं
अगर वो अपना होता,
अलग होते ही क्यों
जब दो जिस्म एक जां का सपना होता।
खामोशियों की चादर में लिपटे हैं कुछ सवाल,
दिलों की दूरियों पर रोता है आज ये मलाल,
जो हाथ थामकर उम्र भर चलना सिखाते थे,
वो रास्तों के मोड़ पर यूं अजनबी न होते,
अलग होते ही क्यों
जब दो जिस्म एक जां का सपना होता।
चलो मान लिया कि वक़्त की नाकामियां रहीं,
कुछ तुम्हारी तो कुछ हमारी भी नादानियां रहीं,
पर टूटकर बिखर जाना वफ़ा का दस्तूर तो नहीं,
फासले इतने भी गहरे न होते जो तुम पास होते,
अलग होते ही क्यों
जब दो जिस्म एक जां का सपना होता।
मौसम बदले,साल बीते और बदली ये हवाएं,
मगर आज भी सूनी हैं इस दिल की सदाएं,
तुम लौट आओगे एक दिन,
इसी उम्मीद में आंखें नम हैं,
शिकवे सारे भुलाकर,
इस दिल में अभी भी तुम्हारे
साथ न होने का गम है।

— राजेन्द्र लाहिरी

राजेन्द्र लाहिरी

पामगढ़, जिला जांजगीर चाम्पा, छ. ग.495554