देख रहे माली खड़े
काँटों ने भी ओढ़ ली, फूलों जैसी शान।
देख रहे माली खड़े, किसका करें बखान।।
रंग-बिरंगे फूल हैं, खुशबू सबकी खास।
नकली रंग चढ़ा हुआ, फिर भी पाता पास।।
माली बोला बाग में, सबका अपना मान।
काँटा जब चुभने लगा, भूल गया सम्मान।।
भौंरा मीठी बात कर, पी जाता रस फूल।
फूल खिले जिस डाल पर, जाए उसको भूल।।
खुशबू लेकर फूल की, इतराता बाजार।
मूल कहाँ किसका रहा, बदला सब व्यवहार।
तितली बैठी फूल पर, समझी सच्चा प्यार।
काँटों ने जब घेर लिया, समझ गई संसार।।
माली सींचे रात-दिन, उपवन हो गुलजार।
कुछ फूलों पर नाम लिख, कुछ पर पहरा चार।।
फूल खिले तो तितलियाँ, करतीं खूब निवास।
पतझड़ आते ही मगर, कोई न उनके पास।।
ओस-कणों की आड़ में, धूल छिपाए रूप।
सूरज निकला तो खुला, सबका सही स्वरूप।।
सुगंध के इस देश में, विष भी बिकता आज।
शीशी सुंदर देखकर, भूल गए अंदाज।।
फूलों जैसी बात थी, भीतर छिपे बबूल।
पास गए तो दे गए, काँटों के प्रतिकूल।।
बगिया में कुछ फूल हैं, कुछ काँटों का राज।
माली को पहचानना, पड़ता है हर आज।।
सच की धूप निकल पड़े, छँटे कपट का जाल।
फूल बचें, विष दूर हो, सुंदर हो हर डाल।।
— डॉ. सत्यवान सौरभ
