ज़िंदगी,एक रंगमंच, एक इम्तिहान
“ज़िंदगी और कुछ भी नहीं… बस एक रंगमंच है, जहाँ हम सब महज़ अदाकार हैं। हमें अपना-अपना किरदार निभाकर एक दिन अपने मालिक-ए-हक़ीक़ी के पास वापस लौट जाना है।”
यह दुनिया एक विशाल रंगमंच है और यहाँ बिताया हर लम्हा उस महानाटक का एक दृश्य। हममें से कोई भी इस नश्वर संसार में हमेशा रहने नहीं आया है। इस अज़ीम रंगमंच पर पर्दा उठते ही (जन्म) जीव प्रवेश करता है, अपना-अपना रोल अदा करता है और पर्दा गिरते ही (मृत्यु) चुपचाप रुख़सत हो जाता है।
किरदार अलग, हैसियत अलग मगर मंज़िल एक,
उस सृष्टिकर्ता (मालिक-ए-हक़ीक़ी) ने इस रंगमंच पर हर इंसान को एक जैसी भूमिका नहीं दी है। यहाँ हर एक का किरदार अलग है और हर एक का दायरा अलग। कुछ लोग बहुत लंबे, बड़े और जगमगाते हुए किरदार निभाते हैं, जो दुनिया की नज़र में बेहद अहम नज़र आते हैं। वहीं कुछ लोग बेहद छोटे, ख़ामोश और सीधे-सादे रोल निभाकर पर्दे के पीछे चले जाते हैं।
लेकिन इस कुदरती रंगमंच का सबसे बड़ा सच यह है कि किरदार का छोटा या बड़ा होना मायने नहीं रखता। बड़ा किरदार निभाने वाला कोई इंसान स्वतः महान नहीं हो जाता, और न ही छोटा किरदार निभाने वाला मामूली। इस रंगमंच की असल कसौटी यह है कि किसने अपने किरदार को कितनी सच्चाई, ईमानदारी और शिद्दत के साथ जिया।
ज़िंदगी के रंग और सांसारिक दृश्य
इस जीवन-मंच पर हमें समय-समय पर कई तरह की भूमिकाएँ अदा करनी पड़ती हैं। कभी खुशियों की धूप मिलती है, तो कभी दुखों की छाँव। कभी हम दूसरों के चेहरों पर मुस्कान लाते हैं, तो कभी खुद आँसू बहाकर सब्र और सहनशीलता का पाठ सीखते हैं। लेकिन ये तमाम हँसी-ख़ुशी, ग़म और रोना-धोना महज़ इस नाटक के अस्थायी दृश्य हैं,कोई भी दृश्य हमेशा के लिए ठहरता नहीं। जो समय आज है, वह कल बदल जाएगा।
जब हमारा रोल पूरा हो जाएगा और दी गई मोहलत का वक़्त ख़त्म हो जाएगा, तो यह रंगमंच यहीं छूट जाएगा। न यह संचित शोहरत साथ जाएगी और न ही वह ऊँचा ओहदा। हम सब अपनी पोषाकें और अपने-अपने सामाजिक मुखौटे उतारकर वापस उसी ईश्वर के सामने हाज़िर हो जाएँगे, जिसने हमें इस मंच पर भेजा था।
ज़िंदगी वास्तव में और कुछ भी नहीं,यह महज़ एक इम्तिहान और आत्म-सुधार के लिए मिली एक मोहलत है। इसलिए, जब तक ये साँसें चल रही हैं और रंगमंच का पर्दा गिरा नहीं है, हमें अपना किरदार इस तरह से निभाना चाहिए कि जब हम अपने मालिक के सामने हाज़िर हों, तो हमारा दामन सच्चाई, नेक-नीयती और इंसानियत की मोहब्बत के चिरागों से रोशन हो।
— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह “सहज़”
