बेटियां हमारी
हमारी बेटियां
समाज की निगाहों से
अब भी
असुरक्षित महसूस करती हैं
जब घर से निकलकर
स्कूल, कालेज
या बाजार जाती हैं
गंदी निगाहें
घूरना चालू हो जाती है
यही नहीं
गंदे-गंदे इशारे भी शुरू हो जाते हैं
समाज की विकृत मानसिकता से
जमुई की बेटी की तरह
नंगापन का खेल होता है
कितना वीभत्स रूप है
हमारा समाज
असंस्कारों में फंसा है
पूरा महिला समाज
कहीं न कहीं
गंदी निगाहों का
अंजाम भुगतना पड़ रहा है
पुरुष मानसिकता में
आखिर स्त्रियाँ पुरुषों के लिए ही
ईश्वर ने भेजा है
स्त्रियों को
उपहार की वस्तु समझा जाता है
— जयचन्द प्रजापति ‘जय’
