माँ को कुर्सी दे दो
माँ को कुर्सी दे दो, इतना तो “सम्मान” रहे,
उम्र की ढलती शाम, चेहरे पर मुस्कान रहे।
राजनीति अपने स्थान, मतभेदों में बात रहे,
माँ के सम्मान से ऊपर कैसी “सौगात” रहे?
मंच पे सवाल उठें, सरकारों से जवाब माँगे,
किसी बुज़ुर्ग माँ पर हँसी के तीर नहीं भागें।
कहें वह मिमिक्री, हँसी-मजाक का मंच था,
सवाल ये रहता असम्मान का वह क्षण था?
कुर्सी कोई सत्ता नहीं, न कोई सिंहासन माँगे,
हाँ, थकी हुई उम्र के आगे थोड़ा आसन माँगे।
नेता आएँ, नेता जाएँ, राजनीति के रंग बदलें,
माँ के आँचल की गरिमा पे शब्द कैसे मचलें?
क्योंकि संसद की ऊँची बातें बाद में कह दो,
माँ की झुकी उम्र पर ध्यान देकर मान दे दो।
भाई, माँ को कुर्सी दे दो, माँ को सम्मान दे दो,
राजनीति जितनी हो मानवता को स्थान दे दो।
— संजय एम तराणेकर
