कविता

ओ सिस्टम के बेईमानो

ओ सिस्टम के बेईमानों,
तुम कब तक आंख चुराओगे?
संविधान की पावन प्रति को,
कब तक धूल चटाओगे?
हक़ खा रहे, लहू पी रहे,
ओ रक्तपिपासु कैसे जी रहे,
पिछड़ों की लाशों पर हंसते,
तुम ऐश की ज़िंदगी जी रहे,
गरल से भरा मीठा पानी,
भर भर गिलास पिलाते हो,
SC, ST, OBC के हक़ मारकर,
तुम समता का ढोंग रचाते हो,
फाइल में जो दब जाती है,
वो कराह किसी बेबस की है,
कुर्सी पर जो बैठी है,
वो नीयत ही कुछ संशय की है,
पर याद रखो ओ हुक्मरानों,
यह सन्नाटा कल टूटेगा,
जब दबे-कुचले जागेंगे,
तब हर इक पिंजरा टूटेगा,
अब छले न जाएँगे ये हक़,
अब और न शोषण झेला जाएगा,
तुम्हारी इस बेईमानी का,
एक दिन हिसाब चुकाया जाएगा।

— राजेन्द्र लाहिरी

राजेन्द्र लाहिरी

पामगढ़, जिला जांजगीर चाम्पा, छ. ग.495554

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