शिक्षा एवं व्यवसाय

क्या एआई साक्षरता के लिए भारत पर्याप्त कदम उठा रहा है

एक समय था जब अपना नाम लिख लेना ही साक्षरता मानी जाती थी। फिर कंप्यूटर चलाना सीखना साक्षरता बन गया। आज 24 सितंबर 2026 को साक्षरता का मतलब फिर बदल रहा है। अब यह देखना जरूरी है कि क्या हमारा नागरिक कृत्रिम बुद्धिमत्ता को समझता है, उसका सही उपयोग कर पाता है और उसके खतरों को पहचान पाता है। इसी समझ को एआई साक्षरता कहते हैं। भारत जैसे बड़े देश के लिए यह केवल तकनीक का सवाल नहीं है, यह रोजगार, शिक्षा और लोकतंत्र का भी सवाल है।

इस सवाल का जवाब खोजने के लिए सरकार ने एक बड़ी योजना शुरू की है। 7 मार्च 2024 को इंडिया एआई मिशन को मंजूरी दी गई। इसके लिए 5 साल में 10,371.92 करोड़ रुपये का बजट रखा गया। इसका मकसद है कि देश में एआई के लिए कंप्यूटर की ताकत, डेटा और प्रशिक्षण की सुविधा सबको मिल सके। इस योजना के तहत दिसंबर 2025 तक 38,000 ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट लगाने की बात कही गई है, ताकि छोटे स्टार्टअप और कॉलेज के छात्र भी बड़े एआई मॉडल चला सकें। बिना कंप्यूटर की ताकत के एआई साक्षरता किताबों तक ही सीमित रह जाएगी।

पैसे की बात करें तो तस्वीर मिली जुली है। बजट 2025-26 में इस मिशन को 2,000 करोड़ रुपये दिए गए, जिसे उस समय तक का सबसे बड़ा समर्थन कहा गया। लेकिन बजट 2026-27 में यह रकम घटकर 1,000 करोड़ रुपये रह गई। इससे एक सवाल उठता है कि क्या हम एआई को लगातार चलने वाला निवेश मान रहे हैं या साल दर साल बदलने वाली योजना। स्कूलों में जो हो रहा है, वह उम्मीद देता है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने कहा कि बच्चों को जल्दी एआई से परिचित कराया जाए। इसी के तहत केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड ने कक्षा 6 के लिए 15 घंटे का एआई मॉड्यूल शुरू किया है और कक्षा 9 से 12 के लिए एआई को एक वैकल्पिक विषय बनाया है। साथ में युवाई कार्यक्रम चल रहा है, जिसमें बच्चों को सिखाया जाता है कि खेती, पर्यावरण या स्मार्ट शहर की समस्याओं के लिए एआई से कैसे समाधान बनाया जाए। जब बच्चा खेत की समस्या के लिए एआई मॉडल सोचता है, तब असली साक्षरता शुरू होती है।

बड़ों के लिए भी रास्ते खुले हैं। फ्यूचर स्किल्स प्राइम नाम का राष्ट्रीय कार्यक्रम है, जहाँ अगस्त 2025 तक 18.56 लाख से ज्यादा लोगों ने पंजीकरण कराया और 3.3 लाख लोगों ने एआई का प्रमाणन पूरा किया। इसके अलावा युवा एआई फॉर ऑल नाम से एक मुफ्त कोर्स शुरू हुआ है, जिसका लक्ष्य 1 करोड़ नागरिकों को एआई की बुनियादी जानकारी देना है। यह कोर्स फ्यूचर स्किल्स प्राइम और आई गॉट कर्मयोगी जैसे प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध है और पूरा करने पर भारत सरकार का प्रमाणपत्र मिलता है।

एक अच्छी कोशिश कौशल रथ भी है। 10 फरवरी 2026 को इंडिया एआई ने एक मोबाइल वैन को रवाना किया, जो छोटे शहरों और गांवों में जाकर छात्रों और शिक्षकों को एआई के बारे में बताएगी। यह सोच सही है कि केवल ऑनलाइन कोर्स से काम नहीं चलेगा, गाँव तक जाना होगा। सिर्फ चलाना सीखना ही काफी नहीं है, सही तरीके से चलाना भी सीखना है। इसके लिए नवंबर 2025 में इंडिया एआई गवर्नेंस दिशानिर्देश जारी किए गए, जो सुरक्षित और भरोसेमंद एआई के उपयोग का रास्ता बताते हैं। एआई साक्षरता बिना नैतिकता के केवल नई निरक्षरता को जन्म देगी।

अब सवाल पर वापस आते हैं – क्या ये कदम पर्याप्त हैं। इरादे के स्तर पर हाँ, कदम सही दिशा में हैं। इतना बड़ा मिशन, स्कूल में एआई, 1 करोड़ लोगों को मुफ्त प्रशिक्षण का लक्ष्य, ये सब पहले कभी नहीं हुआ। लेकिन पैमाने पर देखें तो कमी दिखती है। हमारे देश में 50 करोड़ से ज्यादा लोग काम करने योग्य उम्र में हैं, उनके सामने 18 लाख पंजीकरण बहुत छोटा आंकड़ा है। दूसरा, भाषा की दीवार है। ज्यादातर अच्छे कोर्स अभी भी अंग्रेजी में हैं। जब तक एक किसान अपनी भाषा में एआई से सवाल नहीं पूछ पाएगा, तब तक साक्षरता अधूरी है। तीसरा, शिक्षकों की कमी है। एआई पढ़ाने वाले शिक्षक हर स्कूल में नहीं हैं।

इसलिए जरूरत है कि बजट लगातार बढ़े और स्थिर रहे, हर एआई कोर्स 22 भारतीय भाषाओं में स्थानीय उदाहरणों के साथ बने, और एआई साक्षरता में सिर्फ कोडिंग नहीं, बल्कि डेटा की निजता, गलत खबर की पहचान और पक्षपात को समझना भी सिखाया जाए। भारत ने नींव रख दी है, दीवारें उठ रही हैं, पर छत अभी बननी बाकी है। अगर हम यह कर पाए, तो भारत केवल एआई इस्तेमाल करने वाला देश नहीं, बल्कि जिम्मेदार एआई में दुनिया को रास्ता दिखाने वाला देश बनेगा।

— डॉ. शैलेश शुक्ला

डॉ. शैलेश शुक्ला

राजभाषा अधिकारी एनएमडीसी [भारत सरकार का एक उपक्रम] प्रशासनिक कार्यालय, डीआईओएम, दोणीमलै टाउनशिप जिला बेल्लारी - 583118 मो.-8759411563

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