मूक दर्शक
अक्सर महसूस करती हूँ
आत्मा दूर खड़ी
गतिमान है,
तन्हा शरीर
संवेदनाहीन
ज़िंदगी के रास्तों पर गतिमान है।
जैसे कठपुतली के धागे
छूट गए हों हाथों से,
पर पैर अब भी
गतिमान हैं थिरक रहे हैं आदतन।
साँसें चल रही हैं एक नियम की तरह,
पर धड़कनों में कोई राग नहीं,
भीड़ खड़ी है चारों तरफ मेरे,
पर अंतर सन्नाटे का कोई अंत नहीं।
मैं देख रही हूँ खुद को
एक अजनबी की तरह दूर से,
कि जिए जा रहा है कोई मेरी जगह,
बिना मेरी रज़ा के, मजबूरी से।
सारे अहसास कहीं जम से गए हैं,
न कोई शिकवा, न कोई आस है,
निस्पृह वह आत्मा,
इस जीवन-यात्रा की एकमात्र साक्षी है।
— डॉ. अनीता पंडा ‘अन्वी’ बैंगलुरु
