खेतों के नीचे सूखता भारत
भारत की कृषि उपलब्धियों की चमक के पीछे एक गंभीर सच्चाई छिपी है—भूजल का तेज़ी से ह्रास। देश की सिंचाई का 78 प्रतिशत से अधिक हिस्सा भूजल पर निर्भर है और कृषि क्षेत्र भूजल निकासी का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा अपने पास समेटे हुए है। पंजाब, हरियाणा और राजस्थान जैसे कृषि प्रधान राज्यों में भूजल निकासी वार्षिक रीचार्ज से कहीं अधिक हो गई है; पंजाब में तो यह दर 152 प्रतिशत तक पहुँच गई है। यह स्थिति न केवल दीर्घकालिक कृषि स्थिरता को खतरे में डाल रही है, बल्कि ग्रामीण असमानता, ऊर्जा की बढ़ती मांग और पारिस्थितिकी तंत्र के क्षरण जैसे गंभीर परिणाम भी पैदा कर रही है।
इस संकट की जड़ें संरचनात्मक नीतियों और प्रोत्साहनों में निहित हैं। हरित क्रांति के बाद से न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) और सरकारी खरीद की गारंटी ने किसानों को गेहूं-धान की एकाधिकार खेती की ओर धकेला, खासकर पंजाब और हरियाणा में। धान जैसी जल-गहन फसलें, जो स्थानीय जलवायु के अनुकूल भी नहीं हैं, बड़े पैमाने पर उगाई जाने लगीं क्योंकि बाज़ार और नीतियां इन्हें पुरस्कृत करती रहीं। इसके साथ ही कृषि के लिए मुफ्त या भारी सब्सिडी वाली बिजली ने पंपिंग लागत को नगण्य बना दिया, जिससे किसानों के लिए अतिरिक्त भूजल निकालने की सीमांत लागत शून्य हो गई और अंधाधुंध निकासी को प्रोत्साहन मिला। ट्यूबवेल और निजी बोरवेल का तेज़ विस्तार, कमज़ोर विनियमन और सामुदायिक स्तर पर प्रबंधन की कमी ने इस स्थिति को और बिगाड़ दिया।
सिंचाई पद्धतियां भी समस्या को बढ़ावा देती हैं। परंपरागत बाढ़ सिंचाई आज भी व्यापक है, जिसमें पानी की बर्बादी अधिक और दक्षता कम होती है। माइक्रो-इरिगेशन (ड्रिप और स्प्रिंकलर) को बढ़ावा देने वाली योजनाएं मौजूद हैं, पर छोटे किसानों के लिए उच्च प्रारंभिक लागत और रखरखाव की चिंताएं अपनाने की दर को सीमित करती हैं। जलवायु परिवर्तन की अनिश्चितता और मानसून की अनियमितता ने किसानों को भूजल पर और अधिक निर्भर बना दिया है।
इस संकट के परिणाम खेतों से कहीं अधिक व्यापक हैं। गिरते जल स्तर के कारण किसानों को गहरे बोरवेल लगाने और अधिक शक्तिशाली पंप स्थापित करने पड़ते हैं, जिससे सिंचाई की लागत बढ़ती है और छोटे व सीमांत किसान असमानुपातिक रूप से प्रभावित होते हैं। गहरे स्तर से पानी निकालने के लिए अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है, जिससे जल-ऊर्जा संबंध और तंग होता है। पारिस्थितिक दृष्टि से अति-निकासी भूमि के धंसने, तटीय क्षेत्रों में लवणीयता के प्रवेश और जल गुणवत्ता के दीर्घकालिक क्षरण का जोखिम पैदा करती है। सामाजिक स्तर पर जल की कमी कृषि, उद्योग और घरेलू उपयोग के बीच तथा साझा नदी बेसिन वाले राज्यों के बीच संघर्ष को बढ़ावा देती है। आर्थिक रूप से सिंचाई की बढ़ती लागत खेत की लाभप्रदता को कम करती है।
इस चुनौती का समाधान केवल तकनीकी सुधारों से नहीं, बल्कि प्रोत्साहनों, संस्थानों और प्रथाओं को पारिस्थितिकीय सीमाओं के अनुरूप पुनर्संरेखित करने से ही संभव है। सबसे पहले, फसल विविधीकरण को नारे से रणनीति में बदलना होगा। पंजाब और हरियाणा में धान की खेती उसी तरह नहीं चल सकती जैसे बंगाल या असम में; मक्का, दलहन, तिलहन और बागवानी जैसी कम जल-गहन फसलों को समान बाज़ार गारंटी, प्रसंस्करण बुनियादी ढांचे और मूल्य समर्थन के साथ बढ़ावा देना होगा। बिना आर्थिक व्यवहार्यता के विविधीकरण केवल कागज़ पर ही रहेगा। दूसरा, सिंचाई दक्षता का तेज़ी से विस्तार आवश्यक है। प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (पीएमकेएसवाई) के ‘पर ड्रॉप मोर क्रॉप’ घटक ने छोटे किसानों के लिए 55 प्रतिशत तक सब्सिडी के साथ ड्रिप और स्प्रिंकलर प्रणालियों को बढ़ावा दिया है, पर कवरेज अभी भी सीमित है। माइक्रो-इरिगेशन का विस्तार, धान में डायरेक्ट सीडेड राइस और ऑल्टरनेट वेटिंग एंड ड्राइंग जैसी जल-बचत प्रथाओं को अपनाना, और लेजर लैंड लेवलिंग में निवेश खेत के स्तर पर पानी के उपयोग को 30–50 प्रतिशत तक कम कर सकता है।
तीसरा, भूजल शासन को मज़बूत करना होगा। पंचायतों और वॉटर-यूज़र एसोसिएशन के माध्यम से सामुदायिक प्रबंधन, भागीदारीपूर्ण एक्विफर मैपिंग और स्थानीय जल बजटिंग के साथ, निकासी पर जवाबदेही सुनिश्चित की जा सकती है। अति-शोषित ब्लॉकों में नए बोरवेल के लिए अनुमति और बिजली कनेक्शन को सतत निकासी मानदंडों से जोड़ना जैसे विनियामक उपाय स्वैच्छिक प्रयासों के पूरक होने चाहिए। चौथा, सब्सिडी सुधार अपरिहार्य है। फ्लैट-रेट या मुफ्त बिजली से मीटर वाले वॉल्यूमेट्रिक मूल्य निर्धारण की ओर बढ़ना, साथ ही छोटे किसानों की सुरक्षा के लिए लक्षित प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण, बर्बादी को रोकते हुए न्यायसंगत हो सकता है। कृषि सहायता योजनाओं में जल-उपयोग मानदंड शामिल करने चाहिए ताकि जल-कुशल फसलों और प्रौद्योगिकियों को अपनाने वाले किसानों को पुरस्कृत किया जा सके। अंत में, रीचार्ज और संयुक्त उपयोग का विस्तार आवश्यक है। वर्षा जल संचयन, चेक डैम, रीचार्ज शाफ्ट और वाटरशेड प्रबंधन प्राकृतिक पुनर्भरण को बढ़ा सकते हैं, जबकि नहर कमांड क्षेत्रों का विकास और सतह व भूजल के संयुक्त उपयोग को बढ़ावा देना एक्विफर पर अत्यधिक निर्भरता को कम कर सकता है।
भारत एक चौराहे पर खड़ा है: या तो वह अल्पकालिक उपज के लिए भूजल का दोहन जारी रखे, या कृषि को पारिस्थितिकीय वास्तविकता के अनुरूप ढाले। वर्तमान रास्ता ग्रामीण संकट को गहराएगा, असमानता बढ़ाएगा और खाद्य सुरक्षा को कमज़ोर करेगा। विविधीकृत फसलें, कुशल सिंचाई, सुधारे गए प्रोत्साहन और सामुदायिक नेतृत्व वाला शासन—यह वैकल्पिक मार्ग सतत कृषि समृद्धि की ओर ले जाता है। भूजल केवल एक संसाधन नहीं, बल्कि पीढ़ियों की पूंजी है; आज इसका प्रबंधन कैसे किया जाता है, यह तय करेगा कि क्या भारत के खेत उपजाऊ बने रहेंगे या अतीत की यादगार बनकर रह जाएंगे।
— डॉ. सत्यवान सौरभ
