गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

आँखों-आँखों में रात काटी है
दम नहीं निकला सांस बाक़ी है

एक लम्हा, वो ज़िन्दगी सारी
एक ये लम्हा कितना भारी है

कैसी ख़ामोशी चार सू छायी
बहती आँखों से अब सियाही है

हर क़दम भारी, राह बेमानी
कोई रहबर, न कोई साथी है

उसकी मर्ज़ी है कैसे बख़्शे वो
है रज़ा उसकी जैसे राज़ी है

— डॉ. पूनम माटिया

डॉ. पूनम माटिया

डॉ. पूनम माटिया दिलशाद गार्डन , दिल्ली https://www.facebook.com/poonam.matia poonam.matia@gmail.com

Leave a Reply