गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

एक लड़की कि फिर खोजती रह गई,
क्या ख़ता है मेरी सोचती रह गई।

रोज़ दर की तरफ़ देखती रह गई,
एक कोठे पे वो नाचती रह गई।

रक्षा बंधन पे राखी लिए हाथ में ,
एक भाई को वो खोजती रह गई।

जिस्म के भूके थे सब यहां उनसे वो ,
थोड़ा सा प्यार भी मांगती रह गई।

गोद ख़ाली से तूफ़ान उठने लगे,
एक बच्चे को वो देखती रह गई।

जाने ख़ुद को कहां भूल आई है वो,
आज ख़ुद को कोई खोजती रह गई।

कोठे के आगे से गुज़री बारात को,
वो तवाइफ़ फ़क़त देखती रह गई।

ये मेरा जिस्म है या खिलौना कोई,
मुंसिफ़ों से वो ये पूछती रह गई।

जिस पे वो रंग लगवाने लाई थी वो,
ओढ़नी अश्कों से भीगती रह गई।

एक औरत है मुझ में कि देखो ज़रा,
इक तवाइफ़ कहीं चीख़ती रह गई।

अपनी धरती में वो कुछ नहीं बो सकी,
ग़ैर के पौदों को सींचती रह गई।

सिर्फ़ आहट सी दर पर हुई थी मगर,
आज वो रात भर जागती रह गई।

घर का नक़्शा बनाने चली थी मगर,
कुछ लकीरें ही वो खींचती रह गई।

— अरुण शर्मा साहिबाबादी

अरुण शर्मा साहिबाबादी

नाम-अरुण कुमार शर्मा क़लमी नाम-अरुण शर्मा साहिबाबादी पिता -जगदीश दत्त शर्मा शिक्षा-एम ए उर्दू ,मुअल्लिम उर्दू ,बीटीसी उर्दू। जीविका उपार्जन- सरकारी शिक्षक पता-एफ़ 73, पहली मंज़िल,पटेल नगर-3, ग़ाज़ियाबाद। मोबाइल-9311281968 पुस्तकें-खोली, झुग्गी,पुल के नीचे एक पत्ती अभी हरी सी है, मुनफ़रिद,इजतिहाद.मुफ़ीक़ ( सभी कविता संग्रह) पुरुस्कार-उर्दूकी कई संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत। कई सम्मान समारोह आयोजित हुए हैं।

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