विश्वनाथ से ‘नाना’ तक : अभिनय का अमर अध्याय
मुरुद-जंजीरा की धरती पर, जब एक प्रभात खिला,
एक जनवरी उन्नीस सौ इक्यावन, नया अध्याय मिला।
दिनकर के संस्कार मिले, माँ की ममता साथ रही,
एक साधारण-से बालक में, असाधारण बात रही।
रंगों से रिश्ता जोड़ा तो, जीवन का अर्थ मिला,
रंगमंच की तपती राहों में, संघर्षों का साथ मिला।
कला-साधना को कर्म बनाया, अभिनय को पहचान किया,
अपने हर किरदार के भीतर, जीवन का सम्मान किया।
मराठी रंगभूमि से निकले तो, हिंदी जगत ने मान दिया,
‘गमन’ से पहला कदम बढ़ाया, फिर अपना आसमान लिया।
‘अंकुश’ का तेवर याद रहा, ‘परिंदा’ का दर्द अमर,
‘प्रहार’ से निर्देशन चमका, ‘क्रांतिवीर’ हुआ मुखर।
कभी आक्रोश बने पर्दे पर, कभी करुणा की धार बने,
कभी व्यवस्था से प्रश्न किया, कभी जनमन की आवाज़ बने।
किरदार मिले जितने उनको, उतने ही जीवन जीते गए,
अभिनय की अपनी भाषा से, लाखों दिलों में रीते गए।
‘खामोशी’ की गहरी पीड़ा, ‘अग्निसाक्षी’ की आग रही,
‘अब तक छप्पन’ के तेवर में, एक अलग पहचान रही।
‘अपहरण’ हो या ‘राजनीति’, अभिनय अपना रंग लिए,
‘वेलकम’ की हँसी में भी वे, जीवन के कई ढंग लिए।
पुरस्कारों से मान मिला, सम्मानित हुआ हुनर,
राष्ट्रीय पुरस्कारों ने बढ़ाया, कला का गौरव-शिखर।
पद्म श्री ने देश की ओर से, प्रतिभा को सम्मान दिया,
एक कलाकार ने कर्म से, भारत का मान बढ़ा दिया।
पर कला की सीमा केवल, पर्दे तक सीमित नहीं,
जिस हृदय में संवेदना हो, उसकी दुनिया छोटी नहीं।
सूखे खेतों की पीड़ा देखी, किसानों का दर्द जाना,
सेवा को भी कर्म बनाया, यही रहा उनका तराना।
‘नाम फाउंडेशन’ के माध्यम से, सेवा का दीप जलाया,
मकरंद अनासपुरे संग मिलकर, जन-जन का हाथ बँटाया।
कला यदि समाज के काम न आए, तो अधूरी साधना है,
मानवता के आँसू पोंछे, यही कलाकार की भावना है।
विश्वनाथ नाम मिला था, दुनिया ने ‘नाना’ कह डाला,
किसी ने कलाकार माना, किसी ने अपना समझ डाला।
संवादों में आग रही, आँखों में असीम संवेदना थी,
उनके हर अभिनय के भीतर, जीवन की साधना थी।
चेहरे बदलते रहे मगर, पहचान फिर वही रह गई,
पर्दे के पीछे की मेहनत, हर प्रस्तुति में कह गई।
कलाकार चला जाता है, कला मगर जीवित रहती है,
सच्ची प्रतिभा समय के आगे, अपनी गाथा कहती है।
आठ अक्टूबर की वह तारीख, स्मृति-पट पर अंकित होगी,
एक कलाकार की जीवन-गाथा, पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित होगी।
पर्दा गिरा तो क्या हुआ, किरदार अभी भी बोलेंगे,
उनके सशक्त अभिनय के रंग, समय के साथ नहीं डोलेंगे।
नमन उस कला-साधक को, जिसने जीवन को मंच किया,
संघर्षों को सीढ़ी बनाकर, अपना अलग मुकाम किया।
नाना केवल एक नाम नहीं, अभिनय की एक पहचान रहे,
भारतीय सिनेमा के इतिहास में, सदा अमर सम्मान रहे।
दीप बुझा तो क्या हुआ, उजियारा कम नहीं होगा,
सच्चा कलाकार कभी समय की धूल में गुम नहीं होगा।
किरदारों में साँस रहेगा, संवादों में नाम रहेगा,
जब तक कला रहेगी जीवित, नाना का सम्मान रहेगा।
— रूपेश कुमार
