तमस से कॉकरोच तक
तमस के अंधेरों में, जब सत्य भी घबराता है,
झूठ बड़े-बड़े मंचों से सच का पाठ पढ़ाता है।
कभी कोई तमस फैलाता, कोई दीप जलाता,
सत्ता के गलियारों में हरेक कोई खेल रचाता।
धर्म की चादर ‘ओढ़’, कितना कारोबार हुआ,
नफरत के बाजार में इंसान ही लाचार हुआ।
किसका सच हैं आवाज़, किसका अधिकार,
किस हिस्से धूप लिखें, किस हिस्से अंधकार।
जनता देख रही सब कुछ, समझे हैं हर चाल,
कब तक धर्म की ‘आड़’ में बिछता रहें जाल?
न मंदिर दोषी, न मस्जिद, न ‘दोषी’ कोई धर्म,
दोष वहाँ है जहाँ मनुजता हो जाती है बेशर्म।
नफरत के ‘तमस’ को मिलकर दूर भगाना है,
कॉकरोच राजनीति से “लोकतंत्र” बचाना है।
दीपक जलें विवेक के, सच का होगा सत्कार,
तमस मिटे मन से तब, खिल उठे नव संसार!
— संजय एम तराणेकर
