पैसों का बाज़ार और टूटते रिश्ते
संबंधों और अफसानों के बहुत सारे किस्से हैं,
दूर हुए क्या पैसे हमसे दोयम दर्जे के रिश्ते हैं,
खून खौलना,खून बोलना बनी बात इतिहास की,
ताजे और हरे रंग का होना कीमत नहीं है घास की,
भूले भाई,बहन भी भूली बस पैसों की मारामारी है,
लूटने वाले दुश्मन से ही अब सच्ची रिश्तेदारी है,
कागज़ के इन टुकड़ों ने जज़्बात को बौना कर डाला,
प्यार,मोहब्बत,मान-मर्यादा का भी सौदा कर डाला,
वही यहां पर आदर पाता जिसकी जेब करारी है,
बिना दाम के हर एक चाहत लगती एक बीमारी है,
दिखावे की इस महफिल में अब चेहरों पर बस मुखौटे हैं,
बाहर से जो दिखते बड़े हैं,मन से बेहद छोटे हैं,
गले मिलते हैं लोग यहां पर पर दिल में दूरी रखते हैं,
खोट भरे हैं भीतर इतने,फिर भी खुद को साफ कहते हैं,
चिट्ठी-पत्री का वो दौर गया,अब केवल डिजिटल नाता है,
इमोजी में ही सिमट गया अब,जो भी प्यार जताता है,
फुर्सत किसके पास यहाँ है,सबने अपनी राह चुनी,
सन्नाटों से गूंज रही है अब अपनों की ही पुरानी गली,
दिलों के भीतर पनप रही अब एक अजब सी दूरी है,
बिना स्वार्थ के मिलना-जुलना लगता एक मजबूरी है,
मकान तो उंचे बन गए लेकिन आंगन सिमटते जाते हैं,
गर्मजोशी से मिलने वाले नजर कहां अब आते हैं?
वक्त रहते गर संभले न हम,तो बस तन्हा रह जाएंगे,
दौलत के इस अंधी दौड़ में अपनों को हम खो जाएंगे,
लौटा लें वो पुराना सावन,जहां प्रेम की ही बारी है,
क्योंकि पैसों की इस बस्ती में हर सांस आज उधारी है।
— राजेन्द्र लाहिरी
