जब तुम किसी से कुछ कहे!
जब तुम किसी से कुछ कहे,
वो भी तो कुछ सोचे रहे;
तुम प्रभावित उससे हुए,
उसको प्रवाहों हो लिए!
भव तरंगों का सिलसिला,
है भाव का सब तर्जुमा;
सब कुछ उसी पल हो रहा,
ना देश पात्र जुदा रहा!
अब छोड़ दो सब सोचना,
सद्भाव सहृदय बोल ना;
सब में वही हम भी वहीं,
यह भाव ले भव चलो ना!
जब सुधा कर मन चलोगे,
सबको सुधे तुम पाओगे;
आनन्द अद्भुत चखोगे,
लख ब्रह्म को भव भाओगे!
अस्तित्व जो भी हमारे,
उनके भुवन में निराले;
‘मधु’ प्रभु के है इशारे,
वे नित्य प्रति हैं निहारे!
— डॉ. गोपाल बघेल ‘मधु’
