मन के दशानन से लड़ता भीतर का राम
मन के दशानन से लड़ता भीतर का राम
हमारे भीतर भी एक राम है,
जिसका धनुष टूटा हुआ, तीर बिखरे हुए,
और सामने है मन का दशानन।
अपने दस मुखों को यूँ परिभाषित करता है
पहला मुख – काम का,
जो हर सुंदर चीज को भोगना चाहता है।
दूसरा मुख – क्रोध का,
जो जरा सी बात पर सब कुछ जला देना चाहता है।
तीसरा करता लोभ, चौथा छोड़ न पाए मोह ,
पाँचवाँ अहंकार में डूबा, छठा ईर्ष्या भाव न छोड़ पाए
सातवाँ द्वेष से दोस्ती गाँठता तो आठवाँ भय से काँपता
नवाँ वासना के दलदल में फँसता जता
और दसवाँ तो मैं स्वयं हूँ
यही दसवाँ मुख तो सबसे बड़ा है,
इसी में बाकी के नौ मुख पलते हैं।
भीतर का राम लड़ता है, रोज-रोज लड़ता है,
बिना लक्ष्मण, बिना हनुमान, बिना सेना के।
जब जीत जाता है, तो लगता है मन में दीप जल गया।
और जब….जब कभी हार जाता है,
तो वही दशानन बन सिंहासन पर आकर बैठ जाता है,
और राम! फिर वनवास चला जाता है।
यह युद्ध लंका या अयोध्या में नहीं,
बल्कि हमारे, आपके भीतर होता है।
जिसे न कोई देखता है, न खुश होकर ताली बजाता है,
न दशहरे पर कोई पुतला जलता है।
बस! मन का दशानन, रोज नए मुख उगा लेता है,
और हम सबके भीतर का राम
रोज नए-नए बाण गढ़ता रह जाता है,
मन के दशानन से रोज लड़ता
भीतर का राम ठगा सा रह जाता है।
