मिट्टी के दीपों से मन की रोशनी तक: जब दिल रोशन हों, तो हर दिन दिवाली है
दिवाली केवल दीप जलाने, घरों को सजाने और मिठाइयाँ बाँटने का त्योहार नहीं है, बल्कि यह मानव जीवन में प्रकाश, खुशी, प्रेम, आशा और सकारात्मकता का संदेश देने वाला पवित्र अवसर है। मिट्टी के छोटे-छोटे दीपक जब अँधेरी रात में जलते हैं, तो वे हमें याद दिलाते हैं कि अँधेरा कितना भी गहरा क्यों न हो, एक छोटी-सी रोशनी भी उसे दूर करने की क्षमता रखती है। लेकिन सवाल यह है कि क्या दिवाली का यह प्रकाश केवल हमारे घरों और गलियों तक ही सीमित रहना चाहिए या हमारे दिलों और विचारों में भी फैलना चाहिए?
मिट्टी का दीपक हमें सादगी, विनम्रता और सेवा का संदेश देता है। यह स्वयं जलकर दूसरों के जीवन में प्रकाश फैलाता है। मानव जीवन का वास्तविक उद्देश्य भी कुछ ऐसा ही होना चाहिए। यदि हमारी शिक्षा, धन, योग्यता और सफलता दूसरों के काम नहीं आती, तो उनका महत्त्व अधूरा रह जाता है। वास्तविक दिवाली वह है, जब हम किसी निराश व्यक्ति के जीवन में आशा का दीप जलाएँ, किसी गरीब के घर में खुशियाँ लाएँ और किसी जरूरतमंद की सहायता करें।
आज के समय में दिवाली की चमक-दमक कई बार इसके वास्तविक संदेश को पीछे छोड़ देती है। महँगे उपहारों, सजावट, बिजली की लड़ियों और पटाखों की होड़ में हम कई बार उन लोगों को भूल जाते हैं, जिनके पास दो वक्त की रोटी या घर में एक दीपक जलाने के लिए भी पर्याप्त साधन नहीं होते। जब एक ओर इमारतें शानदार रोशनी से जगमगाती हैं और दूसरी ओर कोई परिवार अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष करता है, तो हमें त्योहार के वास्तविक अर्थ पर विचार करने की आवश्यकता है।
दिवाली हमें सामाजिक समानता और मानवता का पाठ भी पढ़ाती है। इस अवसर पर हमें घरेलू सहायकों, मजदूरों, बुजुर्गों, अनाथ बच्चों और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के साथ खुशियाँ बाँटनी चाहिए। किसी बच्चे को किताबें देना, किसी बुजुर्ग की जरूरत पूरी करना, किसी भूखे को भोजन कराना या किसी अकेले व्यक्ति के साथ कुछ समय बिताना भी दिवाली मनाने का एक सुंदर तरीका है। खुशियाँ बाँटने से कम नहीं होतीं, बल्कि कई गुना बढ़ जाती हैं।
मन की रोशनी का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष हमारे विचारों की पवित्रता भी है। ईर्ष्या, नफरत, अहंकार, लालच, भेदभाव और बदले की भावना मनुष्य के भीतर अंधकार पैदा करती हैं। जब हम इन नकारात्मक भावनाओं को छोड़कर प्रेम, सहनशीलता, क्षमा और आपसी सम्मान को अपनाते हैं, तो हमारे भीतर वास्तविक प्रकाश उत्पन्न होता है। किसी से नाराज होने पर उसे क्षमा करना, पुरानी गलतफहमियाँ दूर करना और रिश्तों में फिर से प्रेम पैदा करना भी दिवाली की रोशनी का हिस्सा है।
इस त्योहार को पर्यावरण के अनुकूल बनाना भी हमारी जिम्मेदारी है। पटाखों के कारण वायु और ध्वनि प्रदूषण बढ़ता है, जिसका प्रभाव बच्चों, बुजुर्गों, मरीजों, पक्षियों और जानवरों पर पड़ता है। इसलिए मिट्टी के दीपक जलाने, बिजली की अनावश्यक खपत कम करने, स्वच्छता बनाए रखने और पटाखों से परहेज करने जैसे कदम हमें एक स्वस्थ और सुरक्षित समाज की ओर ले जा सकते हैं। हमें ऐसी दिवाली मनानी चाहिए, जिसकी खुशी किसी दूसरे के लिए परेशानी का कारण न बने।
माता-पिता और शिक्षकों की भी विशेष जिम्मेदारी है कि वे बच्चों को दिवाली के सांस्कृतिक और नैतिक महत्त्व के बारे में समझाएँ। उन्हें बताना चाहिए कि त्योहारों की महत्ता महँगे कपड़ों या उपहारों से नहीं, बल्कि अच्छे व्यवहार, साझेदारी, दया और सेवा से बढ़ती है। यदि नई पीढ़ी त्योहारों को मानवीय मूल्यों से जोड़कर मनाना सीख ले, तो हमारी परंपराएँ और भी अर्थपूर्ण बन सकती हैं।
वास्तव में, दिवाली वर्ष में एक बार आने वाला त्योहार अवश्य है, लेकिन इसका संदेश हर दिन हमारे जीवन में जीवित रहना चाहिए। जब हम किसी की सहायता करते हैं, किसी के चेहरे पर मुस्कान लाते हैं, सच्चाई का साथ देते हैं और समाज में प्रेम तथा भाईचारे को मजबूत करते हैं, तो हमारे जीवन में हर दिन दिवाली जैसी खुशी पैदा होती है।
आइए, इस दिवाली पर केवल घरों की दीवारों और दरवाजों को ही नहीं, बल्कि अपने दिलों और सोच को भी रोशन करने का संकल्प लें। मिट्टी के दीपों से अपने घरों को चमकाएँ और मानवता, दया, प्रेम तथा सेवा के दीपों से समाज को रोशन करें।
क्योंकि वास्तविक दिवाली वह नहीं है, जो केवल एक रात के लिए प्रकाश करे, बल्कि वह है जो हमारे विचारों, व्यवहार और कर्मों में हमेशा के लिए रोशनी भर दे। जब दिल रोशन हों, तो हर दिन दिवाली है।
— डॉ. विजय गर्ग
