प्रीत की रीत ( कविता )
प्रीत की रीत काश सीख पाती मीरा जैसी प्रीत जगाती तन-मन की सुधि बिसराऊँ मीरा के रंग में मैं रंग
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Read Moreप्रिया से फोन पर बातें करते हुए शौर्य बीच-बीच में कुछ पल के लिए बिल्कुल खामोश हो जाते थे ।
Read Moreरात के बारह बज चुके थे ,नींद का नामोनिशान नहीं था । ओह; कहने को तो भरा पूरा परिवार है
Read Moreसंघर्ष का दूसरा नाम जिंदगी है ,यह बात माँ पापा घुट्टी की तरह उमा को बचपन से सिखाते आ रहे
Read Moreएक छोटा सा प्रयास रंग लाई दबी सहमी सी रहने वाली गुड़िया वर्षों बाद खुल कर मुस्कूराई। हर रोज पूछती
Read Moreक्रिसमस की पार्टी का आनंद कॉलोनी के बूढ़े-बच्चे उठा रहे थे। स्वाभाविक है जहाँ धूँआ वहाँ आग होगा ही ,ठीक
Read Moreपुरब और पश्चिम बदल रही है सोच या हवा बदल रही पुरब की हवा अब पश्चिम से जा मिली आरक्षण
Read More“दादी माँ; माँ कहती हैं हमलोगों को बचपन में हमारी नानी माँ या दादी माँ कहानी सुनाया करती थी ।
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