झरने की हर झरती झलकी
झरने की हर झरती झलकी, पुलकी ललकी चहकी किलकी; थिरकी महकी कबहुक छलकी, क्षणिका की कूक सुनी कुहकी! कब रुक
Read Moreझरने की हर झरती झलकी, पुलकी ललकी चहकी किलकी; थिरकी महकी कबहुक छलकी, क्षणिका की कूक सुनी कुहकी! कब रुक
Read Moreकितने कल्पों से संग रहा, कितने जीवन ग्रह छुड़वाया; रिश्ते नाते कितने सहसा, मोड़ा तोड़ा छोड़ा जोड़ा! परिवार सखा जीवन
Read Moreऊर्ध्व उठ देख हैं प्रचुर पाते, झाँक आवागमन बीच लेते तलों के नीचे पर न तक पाते, रहा क्या छत
Read Moreकण कण में कृष्ण क्रीड़ा किए, हर क्षण रहते; कर्षण कराके घर्षण दे, कल्मष हरते! हर राह विरह विरागों में, संग वे विचरते; हर हार विहारों की व्यथा, वे ही हैं सुधते! संस्कार हरेक करके वे क्षय, अक्षर करते; आलोक अपने घुमा फिरा, ऊर्द्ध्वित त्वरते! कारण प्रभाव हाव भाव, वे ही तो भरते; भावों अभावों देश काल, वे ही घुमाते! थक जाते राह चलते, वे ही धीर बँधाते; मँझधार बीच तारक बन, ‘मधु’ को बचाते! ✍🏻 गोपाल बघेल ‘मधु’
Read Moreअध्यात्म की कई अवस्थाएँ हैं। शारीरिक व मानसिक स्तर पर अनेक प्रस्फुरण हैं। कुछ अवस्थाओं में कोई व्यक्ति अच्छा समाज
Read Moreतल रहे कितने अतल सृष्टि में, कहाँ आ पाते सकल द्रष्टि में मार्ग सब निकट रहे पट घट में, पहरे
Read Moreवे किसी सत्ता की महत्ता के मुँहताज नहीं, सत्ताएँ उनके संकल्प से सृजित व समन्वित हैं; संस्थिति प्रलय लय उनके
Read Moreअहंकारों की अनंत आँधी में, विचरती विकारों की व्याधि में; उड़े कितने ही व्यथाएँ पाते, स्थिति अपनी कहाँ लख पाते
Read Moreखेलने खाने दो उनको, टहल कर आने दो उनको; ज़रा गुम जाने दो उनको, ढूँढ ख़ुद आने दो उनको !
Read Moreआए हैं अलग रहते थलग, जाएँगे विलग; सहचर हैं रहे सूक्ष्म काल, संचरी सुमग ! सौंदर्यवान सुभग धरा, रहत हमरे
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