हास्य कविता
आधुनिक नारी आधुनिक नारी यह तो है सब पे भारी। कोई न पाए पार ऐसी इसमें होशियारी। जीवन इसका व्यस्त
Read Moreआधुनिक नारी आधुनिक नारी यह तो है सब पे भारी। कोई न पाए पार ऐसी इसमें होशियारी। जीवन इसका व्यस्त
Read Moreसरहदों को सुरक्षित रखता रहा। खुद को यूंही समर्पित करता रहा। भेद नहीं आता जाति पंथ का सबको बस इन्सान
Read Moreजितने सुख एक इन्सान की चाहत होते हैं लगभग वो सब मीना के घर पर थे। शादी के बाद भी
Read Moreबाहर इतनी सर्दी थी कि हाथ पैर सुन्न हो रहे थे मगर शोभा तो डर से पसीना पसीना हो रही
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