कविता – सुख-दुःख हैं जीवन के मेहमान
सुख-दुःख जीवन के,बस मेहमान हुआ करते हैं,बारी-बारी आकर कुछ पल रुककर रवाना हुआ करते हैं,कभी हँसी की धूप खिलाते,कभी आँसू
Read Moreसुख-दुःख जीवन के,बस मेहमान हुआ करते हैं,बारी-बारी आकर कुछ पल रुककर रवाना हुआ करते हैं,कभी हँसी की धूप खिलाते,कभी आँसू
Read Moreदूसरों की गलतियों पर हम,उँगली उठाते रहते हैं,अपनी कमियों के आगे मगर,अक्सर मौन ही रहते हैं,पराई गलती दिख जाए तो,चेहरा
Read Moreसही राह चुनो,चाहे राह में काँटे हज़ार हों,सच के साथ चलो,भले खिलाफ़ संसार हों,झूठ की चमक पल दो पल आँखों
Read Moreवैश्विक स्तरपर आज हर देश पर्यावरण समस्याओं का सामना कर रहा है जिसका समाधान खोजने उसपर अमल करने के लिए
Read Moreअभी भी समय है कद्र करो पिता की, प्रसन्नचित हो जाएँकहीं देर ना हो जाए,पिता उस देश चले जाएँन चिट्ठी
Read Moreसैंतालीस से सड़सठ के बीच जन्मे,वो पीढ़ी कहलाए,कम साधन में भी मुस्काकर,जीवन के दीप जलाए।बच्चों! जब ये चले जाएँ,ये बातें
Read Moreपहले के युग में हँसी थी,रिश्तों का मधुर गान,छोटी-छोटी खुशियों में बसता था सारा जहान।आज सुविधाएँ बढ़ीं,पर मन क्यों रहता
Read Moreमाता-पिता की शरण में,अनंत वैकुण्ठ सुख समाया है,उनके चरणों में ही जीवन का सच्चा उजियारा छाया है।मंदिर-मस्जिद, तीर्थ सभी अपनी-अपनी
Read Moreभावना को समझने के लिए मन चाहिए,दुखों को समझने के लिए अपनापन चाहिए।ईश्वर को समझने के लिए श्रद्धा चाहिए,और इंसान
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