Author: *मनमोहन कुमार आर्य

धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

वैदिक धर्म के कुछ मुख्य सिद्धान्त जिनका प्रचार आर्यसमाज करता है

ओ३म् वैदिक धर्म विश्व का सबसे प्राचीन धर्म व मत है। वैदिक धर्म का प्रचलन वेदों से हुआ। वेद सृष्टि

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आर्यसमाज ज्ञान विज्ञान से पोषित सनातन वैदिक धर्म का रक्षक एवं प्रचारक है

ओ३म् संसार में अनेक संगठन एवं संस्थायें हैं। इन सबमें आर्यसमाज ही एकमात्र ऐसा संगठन है जो मनुष्य मात्र के

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धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

मनुष्य का कर्तव्य सद्गुणों से युक्त होना तथा दुर्गुणों को हटाना है

ओ३म् मनुष्य के जीवन व कार्यों पर दृष्टि डालते हैं तो वह अनेकानेक प्रकार के कार्य करते हुए दृष्टिगोचर होते

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मनुष्य को सुख ईश्वर की भक्ति व सत्कर्मों से ही मिलता है

ओ३म् हमें जो सुख व दुःख की अनुभूति होती है वह शरीर व इन्द्रियों के द्वारा हमारी आत्मा को होती

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सृष्टि बनाकर हमें मनुष्य जन्म एवं सुख आदि देने से ईश्वर उपासनीय है

ओ३म् हम मनुष्य हैं। हमें यह मनुष्य जन्म परमात्मा ने दिया है। जन्म व मृत्यु के मध्य की हमारी अवस्था

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वैदिक धर्म सत्य सिद्धान्तों से युक्त तथा अन्धविश्वासों से मुक्त है

ओ३म् वैदिक धर्म ही मनुष्य का सत्य व यथार्थ धर्म है। इसका कारण वैदिक धर्म का ईश्वरीय ज्ञान वेदों पर

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वेदों के प्रकाश से ही संसार को ईश्वर सहित धर्म आदि का ज्ञान हुआ है

ओ३म् संसार में किस सत्ता से ज्ञान उत्पन्न व प्राप्त हुआ है? इस विषय का विचार करने पर ज्ञात होता

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सद्धर्म वेद के प्रचार में मत-मतान्तरों की अविद्यायुक्त बातें बाधक

ओ३म् संसार में अनेक मत–मतान्तर हैं। विचार करने पर यह विदित होता है कि ऐसा मनुष्यों व आचार्यों की अल्पज्ञता

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यह सृष्टि ईश्वर ने जीवों के सुख तथा मोक्ष के लिये बनाई है

ओ३म् एक अदृश्य सत्ता से यह जगत बना है। उसी सत्ता ने हम जीवात्माओं के शरीर भी बनायें हैं और

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ऋषि दयानन्द के तप, त्याग व भावनाओं को ध्यान में रखकर हमें वेदभाष्य सहित उनके सभी ग्रन्थों का स्वाध्याय करना चाहिये

ओ३म् ऋषि दयानन्द संसार के महापुरुषों में अन्यतम थे। उन्होंने जो कार्य किया वह अन्य महापुरुषों ने नहीं किया। उन्होंने

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