स्मिता पाटिल,अभिनय की अनंत गहराई
स्मिता पाटिल का अभिनय भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक ऐसा अध्याय है जो यथार्थवाद, संवेदनशीलता और स्त्री-संघर्ष की अनकही
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Read Moreदेवदार की बहती आँखें दर्द से कराह रहीं हैं,तनों पर ज़ख्म ख़ून की लकीरें बोल रही हैं।कुल्हाड़ियाँ सिर्फ लकड़ी नहीं
Read More1980 के दशक का सिनेमा अपने आप में एक सांस्कृतिक और सामाजिक घटना था। उस दौर में बड़े पर्दे पर
Read Moreसर्दियों की वो प्यारी ठूंठरन अब कहाँ,वो लकड़ी के अलाव चिंगारियाँ कहाँ।सर्दियों की वो दिलकश गर्माहट कहां,अब वो गाँव के
Read Moreसर्दियों की वो ठंडी सुबहें और शामें याद आती हैं जब धुंध की पतली चादर गाँव की गलियों पर उतर
Read Moreसारा ब्रह्मांड और समस्त मानव जीवन उसी एक सर्वशक्तिमान ईश्वर की अद्भुत रचना है, जिसे हम भाषा, धर्म और संस्कृति
Read Moreबेटियां परिवार की वह अमूल्य धरोहर होती हैं जो न केवल घर की ख़ूबसूरती और गरिमा बढ़ाती हैं, बल्कि समाज
Read Moreदिसंबर की ये सर्दी है मैं न कहता था,आ जाओ न क़रीब मैं न कहता था,नज़र को अपनी नज़र से
Read Moreसर्दियों का मौसम शरीर के लिए एक ऐसा समय होता है जब ठंड और सूखेपन के कारण शरीर की रोग-प्रतिरोधक
Read Moreकुछ लोग अपनेचले जाते हैं।इतनी ख़ामोशी सेकि उनके जाने की आहट भीकानों तक नहीं पहुँचती। फिर हर रोज़मन यही सोचता
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