Author: डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह

लघुकथा

बेटा, ज़िंदगी आसान भी है और मुश्किल भी, फ़र्क केवल नज़र का है

प्रिय अमन, मेरी आँखों के तारे, नूर‑चश्म,बेटा,  तुम बचपन में मेरे कंधे पर सिर रखकर ज़िद किया करते थे, कभी

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गीतिका/ग़ज़ल

बेचैनियां बदलती रहीं करवटें रात भर,

आंखों में साहिलों की तरह बेचैनियां रहीं,हाथों में इंतज़ार की बस बैसाखियां रहीं।उम्मीदें इधर उधर बस यूं ही भागती रहीं,मौजें

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भाषा-साहित्य

किताबों में बंद कहानियाँ हमारे सामाजिक, सांस्कृतिक और मानसिक विकास का आधार हैं

किताबें केवल काग़ज़ के पन्नों का ढेर नहीं होतीं। ये मानव के सदियों पुराने अनुभव, ज्ञान, आशाएँ और आँसुओं का

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