पत्थरों का गीत
पहाड़ों का सीना चीरकर जोचश्मे बाहर आते हैं,वे पानी का बहाव नहीं, धरतीकी धड़कन बन जाते हैं।जब टकराते हैं राहों
Read Moreपहाड़ों का सीना चीरकर जोचश्मे बाहर आते हैं,वे पानी का बहाव नहीं, धरतीकी धड़कन बन जाते हैं।जब टकराते हैं राहों
Read Moreशहरों की अंधी दौड़ से जबथककर चूर होते हैं,तब इन अडिग पहाड़ों के हमथोड़े करीब होते हैं।ये वीर वन,ये ऊंचे
Read Moreझुक कर ज़रा वो मस्त निगाहें मिला के ला,साग़र में अक्स-ए-ज़ुल्फ़ का जादू जगा के ला। कहते हैं बज़्म-ए-शौक़ में
Read Moreआज का मानव विकास और तकनीक के शिख़र पर बैठकर भी भीतर से अत्यंत अशांत और बेचैन है। हम एक
Read Moreइतिहास, संस्कृति और मानवीय मूल्यों के मामले में हमारा समाज जितना प्राचीन और समृद्ध रहा है, दुर्भाग्य से यहाँ अंधविश्वास,
Read Moreबदल दी हमने राह अपनी वक़्त के रहते रहते,उतार दी ज़ंजीरें-रिश्तों की वक़्त के रहते रहते।थक गए थे हम चिराग-ए-आरज़ू
Read Moreकिसी भी राष्ट्र की नियति केवल उसकी सीमाओं या सरकारी नीतियों से तय नहीं होती, बल्कि उसके नागरिकों के सामूहिक
Read Moreआज के डिजिट्ल युग में, जहाँ संदेश उंगलियों की एक ‘टैप’ पर पहुँच जाते हैं, बीते दौर के वो नीले
Read Moreसाहित्य केवल शब्दों का विन्यास नहीं, बल्कि समाज की चेतना का जीवंत दस्तावेज़ होता है। वर्तमान समय में तकनीकी प्रगति
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