कविता
सभ्यता के मुहाने परखड़ी है कुछ स्त्रियाँपरंपरा की फटी- पुरानीवेशभूषा धारण करअतित का हाथ थामे खड़ी हैवर्तमान को अस्वीकार करतीभविष्य
Read Moreवह दिल्ली में हैउसने बताया, वहाँ ओले गिरेऔर पूछा क्या अपने यहाँ भी गिरे है?मैंने बताया नहींगर्मी है! भीषण गर्मी!बोली
Read Moreबंद हूं मैं, कैद हूं मैंघूट रही हूं मैं, घट रही हूं मैंपराधीन हूं, ना स्वाधीन मैंबेमोल सी हूं अर्थहीन
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