कविता : चिट्ठियाँ जाने कहाँ खो गयीं
एक ज़माना था चिट्ठियाँ ख़ुशियों का सबब बनती थीं दुखों के पहाड़ भी टूट पड़ते थे पत्र पढ़कर संदेसा देस
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Read Moreवैसे तो ज़िन्दगी हर घड़ी इक इम्तिहान है किन्तु पूर्व-नियोजित परीक्षाएँ तो कहा जाता है बचपन, जवानी की ही पहचान
Read Moreवो इक टूटा-फूटा, उजड़ा मकान है दरवाज़े हैं, खिड़कियाँ हैं,साँकल भी है पुरानी-सी बहुत-से ताले नहीं , इतने बड़े मकान में अब केवल एक ताला है फ़र्श है
Read Moreजब आँगन में मेघ निरंतर झर-झर बरस रहे हों ऐसे में दो विकल हृदय मिलने को तरस रहे हों जब
Read Moreआँखें ज़मीन में गढ़ाए, ठोढ़ी लगभग सीने में धसी हुई, एक पैर के अँगूठे से दूसरे पैर के अँगूठे के
Read Moreराम मिले सीता को जैसे , मुझको भी तुम मिल जाओ तोड़ धनुष को वरण करो तुम, राम मेरे तुम
Read Moreपति, बच्चे, नाती-पोते, रिश्तेदार, साहित्य और कार्यक्रम …कैसे एडजस्ट होता है ये सब? मैं अपने पति, सास-श्वसुर और छोटी बेटी
Read Moreदूर तक फैले समुंदर की तरह गोशे-गोशे में मेरे तुम ही समाये हो दिल करता है अब दिल से निकल
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