अंकों की अंधी दौड़ और खोता बचपन
“अंकों की इस दौड़ में, बचपन हुआ उदास।कंधों पर उम्मीद का, भारी पड़ा लिबास॥” भारत जैसे विकासशील देश में शिक्षा
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Read Moreजब से आई गाँव में, ये शहरी सौगात।मेड़ करें ना खेत से, आपस में अब बात।। पीपल वाली छाँव भी,
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Read Moreतीस दिनों के दर्द में, बने न जिसकी ढाल।उससे चाहो उम्र भर, सेवा फिर हर हाल।। जननी बनते ही नहीं,
Read Moreजिनके सिर है पाप की, ब्याज समेत उधार।बनकर साहूकार वो, करने चले सुधार।। खुद दलदल में धँस चुके, दें जग
Read Moreभारत में राज्यों का लगातार बढ़ता ऋण-से-सकल घरेलू उत्पाद अनुपात आज केवल एक आर्थिक संकेतक नहीं, बल्कि देश की वित्तीय
Read Moreदेश में इन दिनों नीट परीक्षा को लेकर ऐसा माहौल बना हुआ है मानो कोई रहस्य-रोमांच से भरी वेब सीरीज़
Read Moreनोट कहाँ कब बोलते, करते सिक्के शोर।केवल औछे लोग ही, दिखलाते हैं जोर।। धन-दौलत के मद फँसे, भूले सब व्यवहार,अहंकारों
Read Moreभारत के लगभग हर छोटे-बड़े शहर की एक भयावह तस्वीर अब आम होती जा रही है—कूड़े के ढेर में भोजन
Read Moreकाश दिखावे छोड़कर, समझें माँ के घाव,जीते जी ही दे सकें, उसको अपना ठाँव॥ मातृत्व दिवस पर करें, माँ का
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