कहानी – मायका
तेरहवीं की भीड़ अब छँट चुकी थी। जो रिश्तेदार आए थे, वे अब लौट चुके थे। दीवारों पर अब भी
Read Moreतेरहवीं की भीड़ अब छँट चुकी थी। जो रिश्तेदार आए थे, वे अब लौट चुके थे। दीवारों पर अब भी
Read Moreकामकाजी स्त्रियाँ सिर्फ ऑफिस से नहीं लौटतीं, बल्कि हर रोज़ एक भूमिका से दूसरी में प्रवेश करती हैं—कर्मचारी से माँ,
Read More“नमस्ते महोदय/महोदया, क्या आप व्यक्तिगत ऋण लेना चाहेंगे?” कभी दोपहर की झपकी के बीच, कभी सभा के समय, कभी मंदिर
Read Moreमैंने देखा —शिव की गूंज में डूबेकंधों पर उठाए भक्ति के भार,पर आंखों मेंज्ञान की उजास नहीं थी…बस नशा था
Read Moreबचपन में हम सुनते थे कि साध्वी वह होती है जो मोह, माया, श्रृंगार, आकर्षण और सांसारिक जिम्मेदारियों से ऊपर
Read Moreझूले की डोरी से उलझे हैं प्रश्न,हर सावन में मैं स्वयं से टकराती हूँ।मेंहदी रचती हूँ हथेली पर,पर हथेली खुद
Read Moreकोख में किसी बच्चे की पहली चीख, बाहर आने के बाद की नहीं होती। वह तो भीतर ही कहीं, सिसकती,
Read Moreकोख की दीवारों से आतीधीमी-धीमी हिचकियाँ,जैसे कोई जीवनमौत से पहले पूछ रहा हो —“क्या मेरा अपराध सिर्फ़ बेटी होना है?”
Read Moreकुत्ते को गाड़ी में बैठा दिया,बापू को धूप में छोड़ दिया।पंखा चला कुत्ते की खातिर,माँ को पसीने में तोड़ दिया।
Read Moreहम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जहाँ स्क्रीन पर दिखना असल में जीने से ज़्यादा जरूरी हो गया
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