व्यंग्य – ऋतुराज का राज !
पधारो वसंत! तुम हर साल की तरह इस बार भी बिन बुलाए आ गए? बड़े बेशरम हो भाई!! तुम ऋतुराज
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Read Moreसरहद पर खूनी स्याही से, वीरों ने नाम लिखे होंगेजल-हिम-माटी के कण-कण में, वीरों के नाम छिपे होंगेधड़कन ने रिश्वत
Read Moreलेखनी!कुछ फूल श्रद्धा के भी तुम उन पर चढ़ा दो। जो धरा की गोद में ,सब कुछ लुटाकर सो गए
Read Moreऐसा लग रहा है कि पिछड़ने का यही सिलसिला रहा तो भारतवासी स्वयं को आदिमानव भी घोषित कर देंगे। बड़ा
Read Moreसाधुओं !जश्न मनाओ। देश अपनी सांस्कृतिक विरासत का पालन कर रहा है। पूरब से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक
Read Moreआयु के पाँच वर्ष तक चंदा मेरा मामा था। थोड़ी अक्ल आयी तो उसे शिव जी के माथे पर देखकर
Read Moreआजकल ऐसा लग रहा है, आठ – दस महीने बाद देश में दूध की नदियाँ बहने वाली है। मोहल्लों की
Read Moreजब आँसू ही सूख गये अपनी पलकों में,तब पीड़ा का मोल भला क्या हो पायेगा?जब कलियों को लूट लिया बागी
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