संपादक के प्रति समर्पण
बार-बार रचना पत्रिका के संपादक जी को भेजते-भेजते थक गये हैं। अगर पत्रिका में जगह नहीं मिली। इसका सीधा सरल
Read Moreबार-बार रचना पत्रिका के संपादक जी को भेजते-भेजते थक गये हैं। अगर पत्रिका में जगह नहीं मिली। इसका सीधा सरल
Read Moreअभी अँगूठे का ही जमाना है। पहले लोगों को ऊँगली या अँगूठा दिखा दो तो लोग लाठियाँ निकाल लेते थे।
Read Moreचुनाव संपन्न हो चुके थे। लोकतंत्र का महाकुंभ अब “रिज़ल्ट दर्शन” की साधना में लीन था। टिकड़मों की ढोलक बज
Read Moreचंदाराम पढ़ लिखकर नौकरी की तलाश में थे। विपत्ति की मारी सरकार बेचारी रोजगार नहीं दे सकी। नून-तेल के लाले
Read Moreअरें सुनो भोंका राम जी सुबह सवेरे ये कैसी बातें कर रहे हो । किसी भक्त की अगर मनवांछित मनोकामना
Read Moreबहुत ही प्रसिद्ध कहावत है कि ऊँट की चोरी निहुरे- निहुरे नहीं होती।पर यहाँ तो हो गई।शायद चोरों को इस
Read Moreमुझे एक साहित्यिक सम्मेलन में मुख्य अतिथि के तौर पर आमंत्रित किया गया। पहली पर ऐसा साहित्यिक स्नेह मिलने से
Read Moreउस दिन बब्बन चाचा कुछ ज़्यादा ही प्रसन्न थे। चेहरे पर वही चमक थी, जैसी पुरानी अलमारी में अचानक मिले
Read Moreबेरहम गर्मी झेलने के बाद और कितनी मिन्नतों के बाद हमारी मनोकामना पूर्ण हुई और अब कहना पड़ रहा है
Read Moreबायलॉजी के चीर-फाड़ से बचने के लिए, गणित चुन तो लिया पर जब गणित का विकराल रूप त्रिकोणमिति, अलजेब्रा, मेंसुरेशन
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