Monthly Archives: November 2014


  • कविता : वे स्त्रियां

    कविता : वे स्त्रियां

    वे स्त्रियाँ निकली थीं वे अपने वजूद की तलाश में बाजारवाद ने बड़ी बड़ी आंखों से उन्हें देखा खो गई वे उस तिलिस्म दुनिया में बढती महत्वकांक्षाओं के आगे टेक दिए घुट्ने अपना लिया अमेरिका का...


  • प्रतीक

    प्रतीक

      तेरी आँखों में कशिश है मेरा मन भी रसिक है तेरे ओंठ पंखुरियों से गुलाबी है मुझमे भी प्यास अधिक है तेरे मन दर्पण में मेरी ही छवि उभर आई है मेरी चेतना मे गूँजता...


  • लौ

    लौ

      जीने के लिए तुम्हें याद करता हूँ गम ए जाना से फर्याद करता हूँ तन्हा ही जलता हैं अंधेरें में चराग़ तन्हाई में लौ सा तुमसे संवाद करता हूँ सफ़ीना कोई एक डूबने को है...


  • ताँका

    ताँका

    = 1 बेदर्दी शीत विग्रही गिरी हारे व्याकुल होता विकंपन झेलता ओढ़े हिम की घुग्घी। 2 शीत की सरि प्रीत बरसाती स्त्री फिरोजा होती ड्योढ़ी सजी ममता अंक नाश समेटे। 3 हिम का झब्बा काढ़े शीत...