Monthly Archives: June 2015





  • औरत…

    औरत…

    हाँ मिल गई है तुम्हें आज़ादी अब मर्ज़ी से जीने की | अपने विचार बेझिझक सबके आगे रखने की | मगर हकीकत है क्या नहीं अनजान इससे कोई भी | माना आज़ादी का दुरपयोग भी हुआ...

  • कविता

    कविता

    बर्फ़ हुए लम्हों को फिर पिघलाने लगी है तेरे ख़यालों की धूप डर है कंही फिर ना बह पड़े ख्वाहिशों की वो नदी जो इक दिन गुम हो गई थी जुदाई के सहरा में गर ऐसा...


  • हर एक पल कल-कल किए

    हर एक पल कल-कल किए

    हर एक पल कल-कल किए, भूमा प्रवाहित हो रहा; सुर छन्द में वह खो रहा, आनन्द अनुपम दे रहा । सृष्टि सु-योगित संस्कृत, सुरभित सुमंगल संचरित; वर साम्य सौरभ संतुलित, हो प्रफुल्लित धावत चकित । आभास...

  • स्मृति के पंख – 37

    1971 में रमेश की नौकरी देहरादून में मिनिस्ट्री आफ डिफेन्स में लग गई और वह देहरादून आ गया। फिर 1972 में मिनिस्ट्री आफ फाइनेंस में देवास में नौकरी लग गई, जहाँ नया प्रोजेक्ट लगाया गया था।...

  • सच्चे रिश्ते

    सच्चे रिश्ते

    मकान चाहे कच्चे थे लेकिन रिश्ते सारे सच्चे थे… चारपाई पर बैठते थे पास पास रहते थे… सोफे और डबल बेड आ गए दूरियां हमारी बढा गए…. छतों पर अब न सोते हैं बात बतंगड अब...