गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

बनकर के आग तन-बदन में समाने के लिए मचल उठा है वो मेरे अंजुमन में आने के लिए रास आने लगी आरिज ओ गेसू की मस्तियाँ बढ़ने लगी तड़प ख़्वाब हकीकत बनाने के लिए महक उठा है मन का आँगन कुछ इस तरह बेताब है गुंचा ए गुल गुलदान सजाने के लिए चमकते हैं चाँद […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल : कहते दीपक जलता है

  किसकी कुर्वानी को किसने याद रखा है दुनिया में जलता तेल औ बाती है कहते दीपक जलता है पथ में काँटे लाख बिछे हो मंजिल मिल जाती है उसको बिन भटके जो इधर उधर ,राह पर अपनी चलता है मिली दौलत मिली शोहरत मिला है यार सब कुछ क्यों जैसा मौका वैसी बातें , […]

गीतिका/ग़ज़ल

न कभी हाँ कहा….

  न कभी हाँ कहा न कभी ना कहा उसने मेरे सवालों के जवाब में कुछ ना कहा उसने उसकी खामोशी की गहनता भी बोलती है मेरे मन के दर्द को ,दर्द अपना कहा उसने मेरी निगाहों की किताब को पढ़ चुकी है वो चीर कर सीना मुझे मत दिखाना कहा उसने रात भर उसे […]

गीतिका/ग़ज़ल

तेरी जुदाई को…

  तेरी जुदाई को सहना अब आसान नहीं है मेरी आपबीती का तुझे अनुमान नहीं है साये की तरह तेरे संग मैं चलता आया हूँ मेरे खुलूश का और कोई अरमान नही है जबसे तुम गये हो मुझे तन्हा छोड़कर मेरे लबों पर पहले जैसी मुस्कान नहीं है जश्ने बहार आया नही ,पतझड़ गया नहीं […]

गीतिका/ग़ज़ल

हर घड़ी तेरा…

  हर घड़ी तेरा मैं बेसब्री से इंतजार करता हूँ तू आये न आये पर तुझपे ऐतबार करता हूँ तू कौन हैं तेरा नाम है क्या मुझे मालूम नही इब्तिदा से तुझसे मैं बेइंतहा प्यार करता हूँ साहिले वस्ल इस जहाँ में कहीं पर तो होगा सागरे हिज्र को तन्हा कश्ती सा पार करता हूँ […]

गीतिका/ग़ज़ल

महकने लगता है…

  महकने लगता हैं मेरा घर तेरे आने के बाद महकने लगती हैं मेरी साँसें तेरे जाने के बाद अब न कोई गम है ना कोई सितमगर हैं मेरे इश्क़ को तेरे ज़रिए आज़माने के बाद चाँद तारों को भी मुझसे रश्क़ होने लगा है संग तेरे इस मोहब्बत के अफ़साने के बाद तुझमें जुनून ए […]

गीतिका/ग़ज़ल

मैं बाक़ायदा….

मैं बाक़ायदा सृजित आकार नहीं हूँ नवरस हूँ सिर्फ़ छन्द अलंकार नहीं हूँ केवल परहन ए जिस्म न समझना मुझे पहले निराकार हूँ ज़्यादा साकार नहीं हूँ मन का ख्याल हूँ ,ख्वाब हूँ ,तसव्वूर हूँ दिमाग़ का बेतरतीब तल्ख़ विचार नहीं हूँ जबसे तुम मेरी जिंदगी में आए हो गुलज़ार ए बहार हूँ मैं खार […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल : मम्मी तुमको क्या मालूम

  सुबह सुबह अफ़रा तफ़री में फ़ास्ट फ़ूड दे देती माँ तुम टीचर क्या क्या देती ताने, मम्मी तुमको क्या मालूम क्या क्या रूप बना कर आती, मम्मी तुम जब लेने आती लोग कैसे किस्से लगे सुनाने, मम्मी तुमको क्या मालूम रोज पापा जाते पैसा पाने, मम्मी तुम घर लगी सजाने पूरी कोशिश से पढ़ते […]

गीतिका/ग़ज़ल

कश्मकश

  उनकी नफरत में भी प्यार बहुत छुपा हुआ था दर्द अब तक है जो एक कांटा गहरा चुभा हुआ था रोज फूल सा खत मिलते रहने पर उल्फत की सादगी को गुमाँ हुआ था देह से होकर जाती है रूह तक इक राह धरती को चूमने के लिए आकाश झुका हुआ था वो चाहते […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल : दिल में दर्द जगाता क्यों है

गर दवा नहीं है दर्द की तुझ पे दिल में दर्द जगाता क्यों है जो बीच सफर में साथ छोड़ दे उन अपनों से मिलवाता क्यों है क्यों भूखा नंगा व्याकुल बचपन पत्थर भर पेट खाता क्यों है अपने , सपने कब सच होते तन्हाई में डर जाता क्यों है चुप रह कर सब जुल्म […]