कविता

॥ बढ़ई की परेशानी ॥

बढ़ई समझ नहीं पा रहा है
उसकी संरचनाएं
क्यों नहीं होती
किसी कुम्हार की सुराहियों जैसी
लुहार के हँसिए जैसी
या सुनार के जेवरों सरीखी
चिकनी और चमदार

उसे चीरना पड़ता है
एक पूरा शहतीर
आरी चलाते चलाते
थकने लगते हैं हाथ
फूलने लगती है साँस
और फिर भी रह जाता है
काष्ठ खण्ड खुरदुरा और असमतल
आदमी के स्वभाव सा

वह दिन भर घिसता है रंदा
खिलते जाते हैं लकड़ी के फूल
चर्र-चूँ की आवाज़ के साथ
लकड़ी महकती है
हंडिया में रखे बेरों की तरह
छोटे बच्चे की तरह
बढ़ई भूल जाता है
सारा राग द्वेष
उसे आती है अपनी माँ की याद

बढ़ई जोड़ता है लकड़ियाँ
काटता है उन्हें बराबर
बिना विचार किए सिर-पैर का
जैसे हम जोड़ते हैं सम्बंध
किसी स्त्री-पुरुष से
थोड़ा सच-झूठ बोल कर

वह दिलाता है विश्वास
अपने ग्राहकों को
मंदिर की चौखट और चौराहे की गुमटी
उसी ने बनाई थी अपनी जवानी के दिनों में
उसके पुरखों ने ही बनाया था
चंदन की लकड़ी से
सवाई मानसिंह का सिंहासन
बस इन दिनों ही चल रहा है
काम का अकाल

अपनी दुकान के सीलन भरे अहाते में
काटते छीलते हुए कोई लकड़ी का टुकड़ा
बढ़ई सोचता है पत्नी की बीमारी
और बेटी के ब्याह के बारे में
उसे याद आता है
साहूकार से लिया अधचुका कर्ज
और बेरोज़गार बेटे की
बढ़ई न बनने की ज़िद

लकड़ी पर आरी चलाते हुए
भूख खटखटाती है पेट का दरवाज़ा
उसे संदिग्ध लगने लगता है
धरती का भविष्य
बढ़ई परेशान है ईश्वर की तरह!

——— राजेश्वर वशिष्ठ

One thought on “॥ बढ़ई की परेशानी ॥

  • विजय कुमार सिंघल

    बढ़िया. आपने एक श्रमिक की भावनाओं का अच्छा चित्रण किया है.

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